वीडियों शर्मनाक तस्वीर: खाट पर मरीज, 17 किमी पैदल—क्या यही है स्वास्थ्य व्यवस्था?
छत्तीसगढ़ – गरियाबंद जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी है। मैनपुर क्षेत्र के भालुडिग्गी गांव में एक गंभीर बीमार मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को 17 किलोमीटर तक खाट पर लादकर पैदल यात्रा करनी पड़ी। यह घटना न सिर्फ सिस्टम की नाकामी को उजागर करती है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि आखिर सरकार के दावों का जमीनी हकीकत से कितना लेना-देना है?
जानकारी के मुताबिक, भालुडिग्गी निवासी मन्नू नेताम की अचानक तबीयत बिगड़ गई। गांव में न तो कोई प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध थी और न ही समय पर एम्बुलेंस पहुंच पाई। मजबूर होकर ग्रामीणों ने बांस और लकड़ी से एक कांवर (खाट) तैयार किया और उसी पर मरीज को लादकर पैदल ही निकल पड़े। दुर्गम पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए करीब 17 किलोमीटर की कठिन यात्रा कर ग्रामीण मरीज को कुल्हाड़ीघाट तक लेकर पहुंचे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस पूरे घटनाक्रम में 108 एम्बुलेंस सेवा कहां थी? क्या यह सेवा सिर्फ कागजों और विज्ञापनों तक ही सीमित रह गई है? जब एक गंभीर मरीज को समय पर एम्बुलेंस नहीं मिलती, तो यह सीधे-सीधे स्वास्थ्य तंत्र की विफलता को दर्शाता है।
ग्रामीणों के मुताबिक, कई बार फोन करने के बावजूद एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हो सकी। ऐसे में जान जोखिम में डालकर मरीज को कंधों पर उठाना उनकी मजबूरी बन गई। पहाड़ी रास्तों, जंगलों और खतरनाक ढलानों को पार करते हुए ग्रामीण किसी तरह कुल्हाड़ीघाट पहुंचे, जहां से उन्हें प्राइवेट एम्बुलेंस का सहारा लेना पड़ा। इसके बाद मरीज को मैनपुर अस्पताल लाया गया और फिर हालत गंभीर होने पर जिला अस्पताल रेफर किया गया, जहां उसका इलाज जारी है।
यह घटना राज्य सरकार के उन बड़े-बड़े दावों की सच्चाई उजागर करती है, जिनमें ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की बात कही जाती है। सवाल उठता है कि जब दूरस्थ इलाकों में सड़क, एम्बुलेंस और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक की व्यवस्था नहीं है, तो आखिर विकास के दावे किस आधार पर किए जा रहे हैं?
गरियाबंद जैसे आदिवासी बहुल और संवेदनशील क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की यह हालत बेहद चिंताजनक है। यहां के ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। यह पहली घटना नहीं है, जब मरीजों को खाट या कांवर में ढोकर अस्पताल पहुंचाना पड़ा हो। इससे पहले भी प्रदेश के कई हिस्सों से ऐसी शर्मनाक तस्वीरें सामने आ चुकी हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती।
इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। अगर समय रहते सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो ऐसी घटनाएं आगे भी होती रहेंगी और निर्दोष लोगों की जान यूं ही खतरे में पड़ती रहेगी।
अब सवाल यह है कि क्या सरकार इस घटना से सबक लेगी या फिर यह मामला भी बाकी मामलों की तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

