August 17, 2026

नर्सरी एडमिशन पर बड़ा कानूनी बवाल: हाईकोर्ट से किए वादे से पीछे हटी सरकार? बिना मान्यता वाले स्कूलों में धड़ल्ले से प्रवेश, लाखों की फीस वसूली का आरोप

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रायपुर – छत्तीसगढ़ में नर्सरी, एलकेजी और यूकेजी प्रवेश को लेकर एक बार फिर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ता और WPPIL No. 22/2016 में Applicant-in-Person विकास तिवारी ने राज्य सरकार पर हाईकोर्ट में दिए गए आश्वासन का पालन नहीं करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. कमलप्रीत को विस्तृत प्री-लिटिगेशन प्रतिवेदन भेजकर पूछा है कि आखिर सत्र 2026-27 में प्री-प्राइमरी प्रवेश किस कानून और किस नियम के तहत कराए जा रहे हैं।

विकास तिवारी का आरोप है कि राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के समक्ष शपथपत्र देकर प्री-प्राइमरी और फाउंडेशनल स्टेज शिक्षा के लिए नई गाइडलाइन जारी करने का वादा किया था, लेकिन नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद भी सरकार ने न तो कोई नई नीति जारी की और न ही कोई अधिसूचना। ऐसे में पूरे प्रदेश में अभिभावकों, विद्यार्थियों और निजी स्कूलों के बीच भारी भ्रम की स्थिति बन गई है।

उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नई गाइडलाइन ही लागू नहीं हुई तो आखिर निजी स्कूल किस नियम के तहत नर्सरी, एलकेजी और यूकेजी में प्रवेश दे रहे हैं? क्या सरकार ने मौन स्वीकृति दे दी है या फिर पूरा सिस्टम बिना किसी वैधानिक आधार के चल रहा है?

विकास तिवारी ने आरोप लगाया कि प्रदेश में कई प्ले स्कूल और प्री-प्राइमरी संस्थान बिना मान्यता के संचालित हो रहे हैं और वे प्रत्येक छात्र से हजारों से लेकर लाखों रुपये तक फीस वसूल रहे हैं। उनका कहना है कि यह छत्तीसगढ़ फीस नियामक अधिनियम-2020 की भावना का खुला उल्लंघन है। यदि संस्थानों की वैधानिक स्थिति ही स्पष्ट नहीं है तो अभिभावकों से इतनी बड़ी राशि किस अधिकार से ली जा रही है?

प्रतिवेदन में एक और बड़ा विरोधाभास सामने लाया गया है। तिवारी के अनुसार, राज्य सरकार के आधिकारिक RTE पोर्टल पर आज भी तीन वर्ष से साढ़े छह वर्ष तक के बच्चों को प्रवेश स्तर की कक्षा के लिए पात्र बताया जा रहा है। पोर्टल पर योजना का लाभ नर्सरी से लेकर कक्षा 12वीं तक प्रदर्शित किया जा रहा है। दूसरी ओर सरकार ने प्री-प्राइमरी शिक्षा के संबंध में कोई स्पष्ट नई वैधानिक व्यवस्था जारी नहीं की है। ऐसे में सरकारी रिकॉर्ड और जमीनी व्यवस्था एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रहे हैं।

सबसे गंभीर आरोप उन 109 बिना मान्यता वाले विद्यालयों को लेकर लगाया गया है, जिनकी सूची स्वयं राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में प्रस्तुत की थी। विकास तिवारी ने कहा कि इस सूची में कृष्णा किड्स अकादमी की कई शाखाएं भी शामिल हैं। इसके बावजूद इन संस्थानों में आज भी प्री-प्राइमरी कक्षाओं में प्रवेश जारी हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि ये संस्थान बिना मान्यता के हैं तो फिर इन्हें संचालन और प्रवेश की अनुमति किसने दी? यदि मान्यता मिल चुकी है तो उसकी सार्वजनिक जानकारी अब तक क्यों नहीं दी गई?

प्रतिवेदन में सरकार से कई सीधे सवाल पूछे गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से यह जानना चाहा गया है कि बिना मान्यता वाले बताए गए संस्थान वर्तमान में किस वैधानिक प्रावधान के तहत संचालित हो रहे हैं, उनका नियामक विभाग कौन है, क्या उन्हें सत्र 2026-27 में प्रवेश देने का अधिकार प्राप्त है और यदि नहीं, तो उनके खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई है।

विकास तिवारी ने सरकार से मांग की है कि हाईकोर्ट में दिए गए अपने आश्वासन का तत्काल पालन करते हुए प्री-प्राइमरी शिक्षा की नई गाइडलाइन जारी की जाए। साथ ही 109 संस्थानों की वर्तमान कानूनी स्थिति सार्वजनिक की जाए ताकि अभिभावकों के बीच बना भ्रम समाप्त हो सके और भविष्य में बच्चों के हित प्रभावित न हों।

उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि विभाग ने उचित समय में स्पष्ट जवाब नहीं दिया या आवश्यक वैधानिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया, तो यह पूरा प्रतिवेदन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर में लंबित जनहित याचिका में प्रस्तुत किया जाएगा और सरकार के खिलाफ आवश्यक न्यायिक निर्देश की मांग की जाएगी।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार हाईकोर्ट में दिए गए अपने वादे को पूरा करेगी या फिर हजारों अभिभावकों और बच्चों का भविष्य इसी तरह कानूनी अनिश्चितता के बीच उलझा रहेगा। प्री-प्राइमरी शिक्षा को लेकर उठे इन गंभीर सवालों ने सरकार की कार्यप्रणाली पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।

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