कबीरधाम में धान-चावल का बड़ा खेल? नियम ताक पर, मिलरों पर मेहरबान खाद्य विभाग!
रिपोर्ट – संजू गुप्ता
कवर्धा – कबीरधाम जिले में धान खरीदी वर्ष 2025-26 के दौरान सामने आ रहे धान गायब होने के मामलों ने अब एक बड़े प्रशासनिक और विभागीय संकट का रूप ले लिया है। धान उपार्जन केंद्रों से लाखों क्विंटल धान के हिसाब-किताब पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली भी संदेह के घेरे में आ गई है। आरोप है कि छत्तीसगढ़ कस्टम मिलिंग चावल उपार्जन आदेश-2016 के स्पष्ट नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई करने के बजाय कथित तौर पर मिलरों को संरक्षण देने में लगे हुए हैं।
युवा कांग्रेस प्रदेश सचिव आकाश केशरवानी ने सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि जिले में नियमों को ताक पर रखकर धान और चावल के स्टॉक का संचालन किया जा रहा है। इससे न केवल उपार्जन व्यवस्था की पारदर्शिता प्रभावित हो रही है बल्कि धान गायब होने जैसे मामलों की निष्पक्ष जांच भी प्रभावित हो रही है।

नियम 06 की उड़ाई जा रही धज्जियां!
आकाश केशरवानी का आरोप है कि कस्टम मिलिंग चावल उपार्जन आदेश-2016 के नियम 06 के तहत प्रत्येक राइस मिलर को अनुसूची-1 (क), अनुसूची-1 (ख) और अनुसूची-2 के निर्धारित प्रपत्र भरकर खाद्य विभाग में जमा करना अनिवार्य है। इन दस्तावेजों में धान और चावल के स्टॉक से लेकर मासिक उत्पादन, वितरण और बिजली खपत तक का पूरा ब्यौरा दर्ज किया जाना होता है।
लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार विभाग के पास इन अभिलेखों का समुचित रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब रिकॉर्ड ही नहीं है तो आखिर विभाग धान और चावल के वास्तविक स्टॉक का सत्यापन किस आधार पर कर रहा है?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कहीं विभागीय लापरवाही या कथित मिलीभगत के कारण तो नियमों की अनदेखी नहीं की जा रही है।
धान स्टॉक रजिस्टर पर बड़ा सवाल
कस्टम मिलिंग आदेश के अनुसार प्रत्येक मिलर को धान स्टॉक रजिस्टर संधारित करना अनिवार्य है। इसमें प्रारंभिक स्टॉक, खरीदा गया धान, मिलिंग में उपयोग किया गया धान और शेष स्टॉक का पूरा विवरण दर्ज होना चाहिए। साथ ही अधिकृत अधिकारी और निरीक्षण अधिकारी के हस्ताक्षर भी अनिवार्य हैं।
लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि जिले की कितनी मिलों में यह रजिस्टर वास्तव में संधारित किए जा रहे हैं? यदि रजिस्टर हैं तो क्या उनका नियमित सत्यापन किया जा रहा है? और यदि नहीं, तो फिर धान के स्टॉक में होने वाली गड़बड़ियों की जिम्मेदारी किसकी होगी?
जानकारों का मानना है कि यदि स्टॉक रजिस्टरों की नियमित जांच होती रहती तो धान गायब होने जैसी घटनाओं का समय रहते पता लगाया जा सकता था।
चावल स्टॉक रजिस्टर भी जांच के घेरे में
केवल धान ही नहीं, बल्कि चावल के स्टॉक पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आदेश के अनुसार प्रत्येक मिलर को चावल स्टॉक रजिस्टर में प्रारंभिक स्टॉक, प्राप्त चावल, परिदान अथवा विक्रय की गई मात्रा और शेष स्टॉक का पूरा विवरण दर्ज करना होता है।
यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी ताकि मिल परिसर में उपलब्ध चावल की वास्तविक स्थिति का पता लगाया जा सके और किसी भी प्रकार की हेराफेरी रोकी जा सके। लेकिन यदि इन रजिस्टरों का संधारण और सत्यापन नहीं हो रहा है, तो फिर जिले में चावल के वास्तविक स्टॉक का आंकलन कैसे किया जा रहा है? यही कारण है कि अब खाद्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं।
मासिक विवरणी में छिपे हैं पूरे खेल के सुराग
सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज अनुसूची-2 की मासिक विवरणी मानी जाती है। इसमें मिलरों को हर महीने धान और चावल के प्रारंभिक एवं अंतिम स्टॉक, मिलिंग की मात्रा, उत्पादित चावल, परिदान किए गए चावल और शेष स्टॉक का पूरा ब्यौरा देना होता है।
इतना ही नहीं, आदेश के तहत मिलरों को बिजली खपत का विवरण और बिजली बिल की प्रति भी जमा करनी होती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मिलिंग वास्तव में हुई है या केवल कागजों में उत्पादन दिखाया गया है।
जानकारों का कहना है कि यदि बिजली खपत, धान स्टॉक और चावल उत्पादन के आंकड़ों का मिलान किया जाए तो कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आ सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या विभाग ने कभी इन आंकड़ों की गंभीरता से जांच की?
यदि नहीं, तो फिर यह लापरवाही है या कुछ और?
रीसायकलिंग और अवैध खपाने के आरोपों से गरमाया मामला
आकाश केशरवानी ने आरोप लगाया है कि जिले में धान खरीदी वर्ष 2025-26 के दौरान बड़े पैमाने पर धान रीसायकलिंग का खेल हुआ है। उनका कहना है कि उपार्जन केंद्रों से धान उठाकर उसे दोबारा खपाने और रिकॉर्ड में हेराफेरी करने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। उन्होंने बताया कि 5 फरवरी को रबेली-जेवड़न रोड स्थित एक राइस मिल से जेवड़न खुर्द उपार्जन केंद्र में अवैध रूप से धान खपाने की शिकायत खाद्य विभाग को की गई थी। लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उनका आरोप है कि विभाग संबंधित मिलर और उपार्जन केंद्र के जिम्मेदार अधिकारियों को बचाने में जुटा हुआ है।
बाहरी राज्यों से चावल लाकर खपाने का आरोप
मामले को और गंभीर बनाते हुए आकाश केशरवानी ने आरोप लगाया कि जिले में बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों से चावल लाकर स्थानीय व्यवस्था में खपाया जा रहा है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं बल्कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली और धान खरीदी व्यवस्था से जुड़ा बड़ा आर्थिक घोटाला भी हो सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर शिकायतों के बावजूद संबंधित उपार्जन केंद्र प्रभारियों और मिलरों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? क्या विभाग जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है या फिर किसी बड़े संरक्षण तंत्र के तहत यह पूरा खेल संचालित हो रहा है?
कबीरधाम जिले में लगातार सामने आ रहे धान गायब होने के मामलों, स्टॉक रजिस्टरों की स्थिति, मासिक विवरणियों की अनुपलब्धता और शिकायतों पर कार्रवाई न होने से आम जनता के बीच भी नाराजगी बढ़ती जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि नियमों का पालन नहीं कराया गया, रिकॉर्ड का सत्यापन नहीं हुआ और शिकायतों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो धान खरीदी व्यवस्था की विश्वसनीयता कैसे बनी रहेगी?
अब निगाहें जिला प्रशासन, खाद्य विभाग और राज्य शासन पर टिकी हैं। जनता जानना चाहती है कि आखिर धान का हिसाब कौन देगा, जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी और करोड़ों रुपये की इस व्यवस्था में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाएगी? फिलहाल कबीरधाम में एक ही सवाल गूंज रहा है— धान गायब है या पूरा सिस्टम जवाबदेही से गायब हो चुका है?

