March 20, 2026

कुरूद में बेखौफ लकड़ी माफिया का तांडव! प्रतिबंधित कौहा पेड़ काटकर फरार, वन विभाग के सामने खुली चुनौती

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छत्तीसगढ़ – प्रदेश में लकड़ी माफिया के हौसले किस कदर बुलंद हैं, इसका ताजा उदाहरण धमतरी जिले के कुरूद विधानसभा क्षेत्र से सामने आया है। ग्राम जी. जामगांव में दिनदहाड़े प्रतिबंधित कौहा पेड़ को काटकर ट्रैक्टर में लोड किया जा रहा था, और हैरानी की बात यह है कि यह सब कुछ खुलेआम चल रहा था। मानो माफियाओं को कानून और कार्रवाई का कोई डर ही न हो।

सूचना मिलते ही भूपेश एक्सप्रेस की टीम मौके पर पहुंची और जो देखा, उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए। खेत के भीतर कौहा पेड़ को काटकर बड़े आराम से ट्रैक्टर में लोड किया जा रहा था। जैसे ही मीडिया की नजर पड़ी, माफिया सक्रिय हो गए और सफाई देने लगे कि यह सिर्फ “जलाऊ लकड़ी” है। लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ वैध था, तो फिर इतनी हड़बड़ी और भागने की कोशिश क्यों?

मीडिया टीम ने बिना देर किए पूरे मामले की जानकारी धमतरी के डीएफओ को दी। सूचना मिलते ही वन विभाग हरकत में आया और टीम को तत्काल मौके पर रवाना किया गया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जैसे ही वन विभाग की टीम घटनास्थल पर पहुंची, लकड़ी माफिया वहां से फरार हो चुके थे।

हालांकि, इस बार वन अमले ने भी मुस्तैदी दिखाई। बीट गार्ड ने सड़क पर ट्रैक्टर के पहियों के निशान को आधार बनाकर माफियाओं का पीछा शुरू किया। कुछ दूरी पर जी. जामगांव के धान खरीदी केंद्र के पास कौहा लकड़ी फेंकी हुई मिली, जिससे साफ हो गया कि माफिया पकड़े जाने के डर से माल छोड़कर भाग निकले।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। वन विभाग की टीम आगे बढ़ी तो करीब 2 किलोमीटर दूर एक पगडंडी के पास खेत में ट्रैक्टर की ट्रॉली (डाला) छुपाकर रखी हुई मिली। यानी माफिया इतने शातिर हैं कि वे मौके से भागते वक्त सबूत मिटाने की पूरी कोशिश करते हैं। ट्रैक्टर लेकर आरोपी फरार हो गए, लेकिन ट्रॉली और लकड़ी को मौके पर ही छोड़ गए।

वन विभाग ने कौहा लकड़ी और ट्रैक्टर की ट्रॉली को जब्त कर लिया है और आगे की कार्रवाई शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का साफ कहना है कि कौहा पेड़ की कटाई और बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है, ऐसे में यह मामला सीधा-सीधा अवैध तस्करी का है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी घटना बिना किसी स्थानीय मिलीभगत के कैसे संभव है? क्या इस पूरे खेल में जमीन मालिक की भूमिका है? क्या राजस्व विभाग से किसी प्रकार की अनुमति ली गई थी या सब कुछ अवैध तरीके से किया जा रहा था? ये सभी सवाल अब जांच के घेरे में हैं।

इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि प्रदेश में लकड़ी माफिया न सिर्फ सक्रिय हैं, बल्कि बेखौफ होकर काम भी कर रहे हैं। अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो वन संपदा को बचाना मुश्किल हो जाएगा।

फिलहाल वन विभाग जांच में जुटा है, लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि क्या माफियाओं तक पहुंचकर उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई की जाती है, या फिर यह मामला भी कागजों में सिमटकर रह जाएगा।

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