रेत माफियाओं का काला साम्राज्य, शासन-प्रशासन की शर्मनाक निष्क्रियता
राजिम – रेत माफियाओं का काला कारोबार दिन-प्रतिदिन अपने पैर पसार रहा है, और पर्यावरणीय नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए ये माफिया खुलेआम अवैध खनन कर रहे हैं। 15 जून से 15 अक्टूबर तक नदियों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लागू होने के बावजूद, रेत माफिया इस नाजायज धंधे को अंजाम दे रहे हैं। नदियों का दोहन, मिट्टी का कटाव, और पर्यावरणीय संतुलन का विनाश—ये माफिया इन सबकी परवाह किए बिना शासन के राजस्व को चट कर रहे हैं, और उनकी हिम्मत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे रात के अंधेरे में हाईवा की कतारें सजा लेते हैं।

आप जो तस्वीर देख रहे हैं, वह बेलाही घाट मैदान के पास माफियाओं का अस्थायी साम्राज्य है। शाम ढलते ही यहां 50 से 60 हाईवा जुट जाते हैं, जो रात होते-होते तर्री और चौबेबांधा रेत घाटों से अवैध रेत लादकर अपने गंतव्य की ओर रवाना हो जाते हैं। ये मैदान उनके लिए पार्किंग का केंद्र बन चुका है, जहां माफियाओं का तंत्र इतना मजबूत है कि वे बेखौफ अपने काले कारनामों को अंजाम दे रहे हैं। इन हाईवाओं के पहिए न केवल नियमों को कुचलते हैं, बल्कि स्थानीय निवासियों की शिकायतों को भी अनसुना कर देते हैं।
इसी क्रम में पितईबंद घाट पर भी अवैध रेत खनन का कारोबार जोरों पर है। इस घाट के पास अभी दो चेन माउंटेन मशीनें अलग-अलग स्थानों पर सक्रिय हैं, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि माफिया यहां अपनी जड़ें गहरी कर चुके हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि विगत दिनों इस घाट पर पत्रकारों पर हमले की घटना भी हुई थी, फिर भी यह काला कारोबार रुकने का नाम नहीं ले रहा। इससे शासन-प्रशासन की सक्रियता पर सवाल उठना लाजिमी है। खुद राजिम विधायक रोहित साहू ने इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अवैध रेत खनन और परिवहन पर रोक लगाने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए थे। लेकिन धरातल पर केवल खानापूर्ति के सिवाय कुछ नहीं दिख रहा, जो शासन की नाकामी को उजागर करता है।

स्थानीय लोग शासन-प्रशासन पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं कि इस अवैध कारोबार में उनकी मिलीभगत स्पष्ट नजर आती है। क्या यह संभव है कि इतने बड़े पैमाने पर चल रहे इस काले धंधे की भनक शासन को न हो? क्या प्रशासन की आंखों पर पट्टी बंधी है, या फिर यह सत्ता और माफियाओं के गठजोड़ का नतीजा है? रेत माफियाओं की इस बेलगाम करतूत से शासन की छवि धूमिल हो रही है, और जनता के मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर कब तक ये मूकदर्शक बने रहेंगे? पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले इन माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही, यह समझ से परे है। क्या शासन की निष्क्रियता इन माफियाओं को संरक्षण दे रही है?
जनता का गुस्सा फूट पड़ा है, और सवाल उठ रहे हैं कि क्या शासन अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है? रेत माफियाओं का यह काला खेल तब तक जारी रहेगा, जब तक प्रशासन ठोस कदम नहीं उठाता। क्या शासन इस चुनौती का जवाब दे पाएगा, या फिर यह मूकदर्शक बने रहने की अपनी परंपरा को आगे बढ़ाएगा? यह सवाल हर उस नागरिक के मन में गूंज रहा है, जो इस पर्यावरणीय और प्रशासनिक संकट को देख रहा है।

