बीजापुर से जगदलपुर तक तेंदूपत्ता कांड पर उठे बड़े सवाल, डीएफओ हटे लेकिन जवाबदेही अब भी गायब!
रायपुर/बीजापुर/जगदलपुर। छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता संग्रहण और प्रबंधन व्यवस्था पर एक के बाद एक लगी आग ने पूरे वन महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। बीजापुर के एक निजी गोदाम में रखे गए लगभग 10 करोड़ रुपये मूल्य के तेंदूपत्ते के जलकर खाक हो जाने के बाद अभी विभाग संभल भी नहीं पाया था कि अगले ही दिन जगदलपुर से लगे रणसरगीपाल स्थित काष्ठागार डिपो में भी आग लग गई और वहां रखा करीब 10 लाख रुपये का तेंदूपत्ता राख में तब्दील हो गया ।
दो बड़ी घटनाओं ने वन विभाग, लघु वनोपज संघ और शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर करोड़ों रुपये की संपत्ति जल जाने के बाद भी जिम्मेदार कौन है?
मंत्री का एक्शन, डीएफओ हटे… लेकिन क्या यही पर्याप्त है?
बीजापुर अग्निकांड के बाद वन मंत्री केदार कश्यप ने तत्काल कार्रवाई करते हुए बीजापुर वनमंडलाधिकारी रमेश जांगड़े को पद से हटा दिया और रायपुर मुख्यालय अटैच कर दिया। उनकी जगह लघु वनोपज संघ में पदस्थ रहे जाधव सागर को बीजापुर का नया डीएफओ नियुक्त कर दिया गया।
सरकार ने उन्हें तेंदूपत्ता प्रबंधन का जानकार और अनुभवी अधिकारी बताते हुए संवेदनशील जिले की कमान सौंपी है। लेकिन इस नियुक्ति को लेकर भी विभागीय गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। जानकारों के अनुसार, सुकमा में पदस्थापना के दौरान वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बाद जाधव सागर को लघु वनोपज संघ में भेजा गया था। अब वही अधिकारी बीजापुर जैसे महत्वपूर्ण वनमंडल की जिम्मेदारी संभालेंगे।
10 करोड़ का नुकसान… आखिर भरपाई कौन करेगा?
तेंदूपत्ता केवल एक वन उपज नहीं, बल्कि हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका का आधार है। इसकी बिक्री से मिलने वाला लाभांश सीधे संग्राहकों और ग्रामीणों तक पहुंचता है।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जो 10 करोड़ रुपये मूल्य का तेंदूपत्ता जल गया, उसका नुकसान आखिर कौन भरेगा? क्या इसकी भरपाई सरकार करेगी? क्या संबंधित अधिकारियों पर आर्थिक जवाबदेही तय होगी? या फिर मामला सिर्फ तबादलों और विभागीय नोटशीटों में दबकर रह जाएगा?
क्या आग के पीछे सिर्फ हादसा या कुछ और?
वन विभाग से जुड़े कुछ जानकारों का दावा है कि इस वर्ष संग्रहित तेंदूपत्ता असाधारण गुणवत्ता का था। बड़े आकार के और बेहतर श्रेणी के पत्तों की वजह से इसकी बाजार कीमत भी अधिक बताई जा रही थी।
यही कारण है कि अब कुछ हलकों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि कहीं मानक बोरा संख्या, भंडारण या स्टॉक के आंकड़ों में किसी प्रकार की हेराफेरी की आशंका तो नहीं थी। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन करोड़ों के नुकसान ने संदेहों को जन्म जरूर दे दिया है।
सुविधाएं पूरी, फिर भी सुरक्षा फेल क्यों?
वन विभाग के अधिकारियों को शासन द्वारा तमाम संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं। आलीशान सरकारी आवास, कई वाहन, कैंपा से प्रदत्त गाड़ियां, निरीक्षण के लिए अलग वाहन, सुरक्षा व्यवस्था और पर्याप्त अमला मौजूद रहता है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि जब विभाग के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है तो करोड़ों रुपये की वन संपदा की सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई? क्या गोदामों में अग्निशमन के पर्याप्त इंतजाम थे? क्या नियमित निरीक्षण किया गया था? क्या सुरक्षा मानकों का पालन हुआ था?
यदि नहीं, तो इसकी जवाबदेही तय क्यों नहीं की जा रही?
क्या सिर्फ तबादला ही सजा है?
बीजापुर से लेकर जगदलपुर तक हुई घटनाओं के बाद आम जनता और वन क्षेत्र से जुड़े लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या किसी अधिकारी को मुख्यालय अटैच कर देना ही पर्याप्त कार्रवाई है? करोड़ों की वन संपदा जल गई, आदिवासियों का संभावित लाभांश स्वाहा हो गया, विभाग की साख पर सवाल खड़े हो गए, लेकिन अब तक किसी पर आर्थिक या दंडात्मक जिम्मेदारी तय नहीं हुई।
सबसे बड़ा सवाल
बीजापुर में 10 करोड़ और जगदलपुर में लाखों रुपये का तेंदूपत्ता जलकर राख हो गया। सरकार ने कार्रवाई भी की, अधिकारी भी बदले गए, लेकिन अब भी सबसे बड़ा सवाल जस का तस खड़ा है—
आखिर इस पूरे तेंदूपत्ता कांड का जिम्मेदार कौन है?
और जब जवाबदेही तय ही नहीं होगी, तो क्या भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होंगी?
छत्तीसगढ़ के वन महकमे के सामने यह सिर्फ आग की घटना नहीं, बल्कि प्रबंधन, पारदर्शिता और जवाबदेही की अग्निपरीक्षा है। अब निगाहें शासन पर हैं कि वह सिर्फ तबादले तक सीमित रहता है या फिर करोड़ों के नुकसान के पीछे की पूरी सच्चाई सामने लाकर दोषियों पर ठोस कार्रवाई भी करता है।

