ब्रेकिंग: फिर फेल हुआ छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम! 8 हजार निजी स्कूलों के छात्रों पर मंडराया किताबों का संकट, संगठन ने दी आंदोलन की चेतावनी
रायपुर – नए शिक्षा सत्र के शुरू होने में अब गिनती के दिन शेष हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में लाखों विद्यार्थियों तक निशुल्क पाठ्य पुस्तकों की आपूर्ति को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। छत्तीसगढ़ राज्य अशासकीय विद्यालय संचालक संघ ने छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि निगम लगातार दूसरे वर्ष भी पुस्तक वितरण व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने में विफल साबित हो रहा है। संगठन ने निगम की कार्यप्रणाली को “अव्यवस्थित, भेदभावपूर्ण और भ्रष्टाचार से ग्रस्त” बताते हुए सरकार से वितरण की जिम्मेदारी तत्काल वापस लेने की मांग की है।
संघ के प्रदेश अध्यक्ष सुबोध राठी और प्रदेश सचिव मनोज पाण्डेय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ शासन द्वारा कक्षा पहली से दसवीं तक के विद्यार्थियों को निशुल्क पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती हैं, लेकिन वितरण व्यवस्था की खामियों का खामियाजा हर साल विद्यार्थियों, शिक्षकों और स्कूल संचालकों को भुगतना पड़ रहा है।
सरकारी स्कूलों और निजी विद्यालयों के लिए अलग-अलग नियमों पर सवाल
संगठन का आरोप है कि वर्षों से शासकीय विद्यालयों को कक्षा 1 से 8 तक की पुस्तकें संकुल स्तर पर और 9 से 12 तक की पुस्तकें सीधे विद्यालय स्तर पर उपलब्ध कराई जाती रही हैं। वहीं निजी विद्यालयों को जिला मुख्यालय से कक्षा 1 से 10 तक पुस्तकें दी जाती थीं, जिससे व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित होती थी।
लेकिन वर्ष 2025-26 में पहली बार पूरे प्रदेश के निजी विद्यालयों को पुस्तकों के लिए छत्तीसगढ़ के केवल 6 डिपो पर निर्भर कर दिया गया। संघ का कहना है कि जहां सरकारी विद्यालयों को 15 जून तक पुस्तकें मिल गई थीं, वहीं निजी विद्यालयों को बार-बार तारीखें देकर सितंबर तक इंतजार कराया गया। कई स्कूलों को पुस्तकें लेने के लिए दो से तीन बार डिपो के चक्कर लगाने पड़े, जिससे समय और धन दोनों की भारी बर्बादी हुई।
संगठन के अनुसार कुछ विषयों की पुस्तकें तो पूरे शैक्षणिक सत्र में भी उपलब्ध नहीं हो सकीं। विशेष रूप से कक्षा पांचवीं की हिंदी सहित कई शीर्षकों की पुस्तकें छात्रों तक समय पर नहीं पहुंच पाईं।
स्कैनिंग व्यवस्था को बताया तुगलकी फरमान
विवाद का दूसरा बड़ा कारण पुस्तकों की स्कैनिंग व्यवस्था रही। संघ का आरोप है कि निजी विद्यालयों को पुस्तक प्राप्त करते समय डिपो में ही स्कैनिंग करने के लिए बाध्य किया गया, जबकि सरकारी विद्यालयों को विद्यालय स्तर पर स्कैनिंग की अनुमति दी गई थी। संघ ने इसे दोहरा मापदंड बताते हुए कहा कि विरोध और दबाव के बाद निगम को आदेश वापस लेना पड़ा और निजी विद्यालयों को भी स्कूल स्तर पर स्कैनिंग की छूट देनी पड़ी।
प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि स्कैनिंग की व्यवस्था लागू करने के पीछे यह तर्क दिया गया कि शिक्षक पुस्तकों को बाजार में बेच देते हैं। संगठन ने सवाल उठाया कि यदि ऐसा है तो निगम आज तक एक भी ऐसा प्रमाण सार्वजनिक क्यों नहीं कर पाया, जिसमें किसी शासकीय या निजी विद्यालय द्वारा पुस्तकों की बिक्री या दुरुपयोग साबित हुआ हो।
“शिक्षकों पर अविश्वास का प्रमाण”
संघ ने स्कैनिंग व्यवस्था को शिक्षकों के सम्मान पर चोट बताया है। विज्ञप्ति में कहा गया कि पूरे प्रदेश के हजारों शिक्षकों को 15 दिन से लेकर एक महीने तक शिक्षण कार्य छोड़कर केवल पुस्तकों की स्कैनिंग में समय लगाना पड़ा। संगठन ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस व्यवस्था को अपने ही शिक्षकों पर भरोसा नहीं है, वह शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर कितनी गंभीर होगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
निगम पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
प्रेस विज्ञप्ति में यह भी दावा किया गया है कि स्कैनिंग व्यवस्था लागू होने के बावजूद कुछ पुस्तकें विद्यालयों तक पहुंचने से पहले ही कबाड़ में मिलने की खबरें सामने आई थीं। संगठन ने आरोप लगाया कि इससे यह साबित होता है कि वितरण तंत्र में कहीं न कहीं गंभीर गड़बड़ी है। संघ ने कहा कि आज तक इस मामले में न तो किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई और न ही किसी पर कार्रवाई हुई। संगठन का आरोप है कि पाठ्य पुस्तक निगम के भीतर चल रही आपसी खींचतान और कथित भ्रष्टाचार का सीधा नुकसान प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को उठाना पड़ रहा है।
एक साल बाद भी नहीं सुधरी व्यवस्था
संघ के अनुसार वर्ष 2025-26 की अव्यवस्था के बाद उनके प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और पाठ्य पुस्तक निगम के अधिकारियों से मुलाकात कर मांग की थी कि आगामी सत्र से निजी विद्यालयों को भी सरकारी स्कूलों की तरह संकुल स्तर पर समय पर पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएं। संगठन का दावा है कि उन्हें सकारात्मक आश्वासन मिला था, लेकिन इसके बावजूद वर्तमान सत्र 2026-27 के लिए भी वही पुरानी व्यवस्था लागू कर दी गई।
“बुक बैंक योजना ने खोल दी पोल”
संघ ने हाल ही में जारी की गई बुक बैंक योजना पर भी सवाल उठाए हैं। विज्ञप्ति में कहा गया है कि निगम द्वारा जारी पत्र में पुराने विद्यार्थियों से किताबें वापस लेकर नए विद्यार्थियों को देने की बात कही गई है।
संगठन का आरोप है कि यह योजना वास्तव में इस बात की स्वीकारोक्ति है कि निगम नए सत्र के लिए समय पर पुस्तकें उपलब्ध नहीं करा पाएगा। यदि पुस्तकों की छपाई और वितरण समय पर हो रहा होता तो ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
16 जून से सत्र शुरू, लेकिन वितरण की तारीख तक नहीं
सबसे गंभीर मुद्दा यह है कि 16 जून से नया शैक्षणिक सत्र शुरू होना है, जबकि 11 जून तक निजी विद्यालयों को डिपो से पुस्तक प्राप्त करने की कोई समय-सारिणी जारी नहीं की गई है। संघ का कहना है कि प्रदेश में लगभग 8 हजार निजी विद्यालय हैं। यदि एक डिपो प्रतिदिन अधिकतम 40 से 50 विद्यालयों को ही पुस्तकें दे सकता है तो छह डिपो के माध्यम से सभी विद्यालयों तक पुस्तकें पहुंचाने में लगभग तीन महीने का समय लग सकता है। ऐसी स्थिति में विद्यार्थियों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित होगी और सत्र शुरू होने के बावजूद हजारों बच्चे बिना पुस्तकों के पढ़ाई करने को मजबूर होंगे।
सरकार से बड़ी मांग: निगम से वापस ली जाए जिम्मेदारी
छत्तीसगढ़ राज्य अशासकीय विद्यालय संचालक संघ ने सरकार से मांग की है कि पुस्तक वितरण की जिम्मेदारी पाठ्य पुस्तक निगम से वापस लेकर शिक्षा विभाग को सौंप दी जाए। जिला शिक्षा अधिकारी और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के माध्यम से वितरण कराया जाए ताकि पुस्तकें समय पर विद्यालयों तक पहुंच सकें। संगठन ने एक वैकल्पिक सुझाव भी दिया है। संघ का कहना है कि एनसीईआरटी की तर्ज पर पुस्तकों को खुले बाजार में उपलब्ध कराया जाए, ताकि अभिभावक जरूरत पड़ने पर आसानी से खरीद सकें। सरकार चाहे तो डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के माध्यम से पुस्तकों की राशि सीधे विद्यार्थियों के खातों में भेज सकती है।
आंदोलन की चेतावनी
संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि निजी विद्यालयों और विद्यार्थियों को समय पर पुस्तकें उपलब्ध नहीं कराई गईं तो संगठन एक बार फिर आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होगा। प्रदेश अध्यक्ष सुबोध राठी और सचिव मनोज पाण्डेय ने कहा कि बार-बार की अव्यवस्था से यह स्पष्ट हो गया है कि पाठ्य पुस्तक निगम वितरण व्यवस्था संभालने में लगातार असफल साबित हो रहा है। ऐसे में शिक्षा हित और विद्यार्थियों के भविष्य को देखते हुए सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।
छत्तीसगढ़ में नए शिक्षा सत्र की दस्तक के बीच पाठ्य पुस्तकों को लेकर खड़ा हुआ यह विवाद सरकार और पाठ्य पुस्तक निगम दोनों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यदि आने वाले दिनों में वितरण व्यवस्था में तेजी नहीं आई तो लाखों विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होने के साथ-साथ यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप भी ले सकता है।

