June 1, 2026

नर्सरी स्कूलों पर बड़ा बवाल! गैर-मान्यता प्राप्त संस्थानों में एडमिशन रोकने की मांग, मुख्य सचिव से कार्रवाई की गुहार – विकास तिवारी

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रायपुर – छत्तीसगढ़ में संचालित प्ले और नर्सरी स्कूलों की मान्यता को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। राज्य में हजारों अभिभावकों और नौनिहालों के भविष्य से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर सामाजिक कार्यकर्ता एवं जनहित याचिका के हस्तक्षेपकर्ता विकास तिवारी ने मुख्य सचिव को विस्तृत अभ्यावेदन सौंपते हुए गैर-मान्यता प्राप्त प्ले और नर्सरी विद्यालयों में नए प्रवेश पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। साथ ही पूरे मामले में प्रशासनिक जवाबदेही तय करने और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग भी उठाई गई है।

विकास तिवारी ने कहा है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 शुरू हो चुका है, लेकिन राज्य सरकार की ओर से प्ले और नर्सरी स्कूलों के लिए कोई स्पष्ट नियामक व्यवस्था लागू नहीं की गई है। ऐसे में बड़ी संख्या में अभिभावक अनजाने में अपने बच्चों का प्रवेश ऐसे संस्थानों में करा रहे हैं जिनकी मान्यता स्थिति संदिग्ध या अस्पष्ट है। यदि भविष्य में ऐसे स्कूलों के खिलाफ कोई न्यायिक या प्रशासनिक कार्रवाई होती है तो उसका सीधा नुकसान बच्चों और उनके अभिभावकों को उठाना पड़ेगा।

मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि प्ले और नर्सरी विद्यालयों के विनियमन और मान्यता का विषय लंबे समय से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में लंबित जनहित याचिका W.P.(PIL) No.22/2016 के तहत विचाराधीन है। न्यायालय में हुई विभिन्न सुनवाइयों के दौरान भी कई संस्थानों की वैधता और संचालन को लेकर सवाल उठ चुके हैं।

अभ्यावेदन में मांग की गई है कि राज्य के सभी जिलों में संचालित प्ले और नर्सरी विद्यालयों की मान्यता का तत्काल सत्यापन कराया जाए। जिन संस्थानों के पास विधिसम्मत मान्यता नहीं है या जिनकी मान्यता स्थिति विवादित अथवा अप्रमाणित है, उन्हें तत्काल प्रभाव से नए प्रवेश लेने, प्रचार-प्रसार करने और विद्यार्थियों से शुल्क वसूलने से रोका जाए।

विकास तिवारी ने सरकार से यह भी मांग की है कि अभिभावकों को भ्रम की स्थिति से बचाने के लिए राज्यव्यापी सार्वजनिक परामर्श जारी किया जाए। इसके साथ ही जिलेवार मान्यता प्राप्त, गैर-मान्यता प्राप्त और सत्यापनाधीन विद्यालयों की सूची सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जाए ताकि अभिभावक सही जानकारी के आधार पर अपने बच्चों के भविष्य का निर्णय ले सकें।

उन्होंने कहा कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अनियमितता सीधे बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ है। यदि वर्षों से यह मामला न्यायालय में लंबित है तो शासन-प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह स्थिति स्पष्ट करे और आम जनता को सही जानकारी उपलब्ध कराए।
सबसे महत्वपूर्ण मांग पूरे मामले की उच्चस्तरीय प्रशासनिक जांच को लेकर की गई है। तिवारी का कहना है कि न्यायालयीन दस्तावेजों और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर यह जांच की जानी चाहिए कि आखिर इतने वर्षों तक गैर-मान्यता प्राप्त या संदिग्ध संस्थान कैसे संचालित होते रहे। यदि किसी स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही, नियामक विफलता या कर्तव्य निर्वहन में चूक सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों की जवाबदेही तय कर उनके खिलाफ विधिसम्मत कार्रवाई की जानी चाहिए।

इस मुद्दे ने शिक्षा विभाग और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। यदि सरकार इस मांग पर निर्णय लेती है तो प्रदेशभर के सैकड़ों प्ले और नर्सरी स्कूलों की स्थिति की जांच हो सकती है। वहीं अभिभावकों में भी चिंता बढ़ गई है कि कहीं उनके बच्चों का प्रवेश ऐसे संस्थानों में तो नहीं हो गया जिनकी मान्यता स्पष्ट नहीं है।

विकास तिवारी ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी संस्था, व्यक्ति या अधिकारी को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षा व्यवस्था के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने कहा कि जब तक हाईकोर्ट में लंबित मामले का अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक सरकार को एहतियाती कदम उठाकर बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करना चाहिए।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार गैर-मान्यता प्राप्त प्ले और नर्सरी स्कूलों पर तत्काल शिकंजा कसेगी या फिर हजारों अभिभावक अनिश्चितता के साये में अपने बच्चों का भविष्य दांव पर लगाते रहेंगे?

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