EOW की फाइलों से रामकथा के मंच तक! भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अशोक चतुर्वेदी अब ‘डॉ. अशोक हरिवंश’ बनकर आध्यात्म की आड़ में नया खेल, संतों और सत्ता के बीच सबसे आगे बैठा चेहरा! खास रिपोर्ट…
रायपुर – छत्तीसगढ़ की राजनीति, नौकरशाही और सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक नाम फिर जोरदार तरीके से गूंज रहा है — अशोक चतुर्वेदी।
वही अशोक चतुर्वेदी, जिनका नाम कभी EOW-ACB की रेड, आर्थिक अपराधों, निविदा घोटालों, आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्टाचार के मामलों में सुर्खियों में था। लेकिन अब वही चेहरा अचानक “धर्म”, “रामकथा”, “आस्था” और “आध्यात्म” की नई चादर ओढ़कर प्रदेश के सबसे हाई-प्रोफाइल धार्मिक आयोजनों का केंद्र बन चुका है।
शिवरीनारायण में आयोजित भव्य कथा और धार्मिक कार्यक्रम ने अब सिर्फ आध्यात्मिक आयोजन की सीमा पार कर दी है। मंच पर बड़े संत, सत्ता के शीर्ष चेहरे, वीआईपी मौजूदगी और भारी राजनीतिक जमावड़े ने इस आयोजन को सीधे सत्ता और सिस्टम से जोड़ दिया है। मुख्यमंत्री की मौजूदगी, जगद्गुरु रामभद्राचार्य का आगमन और मंचीय तस्वीरों ने पूरे प्रदेश में नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है।
लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है।
क्या यह सचमुच आध्यात्मिक परिवर्तन है… या फिर भ्रष्टाचार के दाग धोने की सुनियोजित रणनीति?
प्रदेश के सरकारी रिकॉर्ड और चर्चित मामलों में सामने आ चुका है कि पाठ्य पुस्तक निगम के पूर्व महाप्रबंधक रहे अशोक चतुर्वेदी पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, निविदा अनियमितता, आय से अधिक संपत्ति और IPC की गंभीर धाराओं 420, 467, 468 और 471 के तहत कार्रवाई हुई थी।
EOW और ACB की जांच, गिरफ्तारी और विशेष अदालत में चालान पेश होने के बाद उनका नाम प्रदेश के सबसे चर्चित आर्थिक अपराध मामलों में शामिल हो गया था। उस दौर में उनका नाम “सिस्टम के बड़े खिलाड़ियों” में गिना जाता था। फाइलों में करोड़ों की गड़बड़ी, सरकारी खरीद में अनियमितताएँ और कथित संपत्ति विस्तार की चर्चाएँ लगातार सुर्खियों में रहीं।
लेकिन वक्त बदला… और अब कहानी भी बदल गई।
आज वही अशोक चतुर्वेदी खुद को “डॉ. अशोक हरिवंश” के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। रामकथा, धार्मिक आयोजन, प्रवचन, आश्रम और “राम मिलेंगे” जैसे अभियानों के जरिए एक नई सार्वजनिक पहचान गढ़ी जा रही है। मीडिया इंटरव्यू दिए जा रहे हैं। मंचों से खुद को निर्दोष बताया जा रहा है। जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए जा रहे हैं। और सबसे बड़ा दावा — “यह सब राजनीतिक प्रताड़ना थी।”
लेकिन क्या जनता इतनी जल्दी सब भूल जाएगी?
सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि जिन मामलों में जांच और कार्रवाई की चर्चा आज भी राजनीतिक गलियारों में जिंदा है, उसी दौरान सत्ता के शीर्ष चेहरे उसी मंच पर दिखाई दे रहे हैं।
इससे संदेश क्या जा रहा है?
क्या यह सिर्फ धार्मिक आस्था का कार्यक्रम था?
या फिर सत्ता और सिस्टम के बीच किसी नए समीकरण की पटकथा लिखी जा रही है?
आश्रम की जमीन पर भी उठने लगे सवाल
सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के मुताबिक शिवरीनारायण में जिस विशाल आश्रम और धार्मिक परिसर का निर्माण हुआ है, उसकी जमीन को लेकर भी अंदरखाने कई सवाल तैर रहे हैं।
जमीन का मूल रिकॉर्ड क्या है?
उपयोग परिवर्तन कैसे हुआ?
स्वामित्व किसके नाम है?
निर्माण प्रक्रिया में किन नियमों का पालन हुआ और किनका नहीं?
स्थानीय स्तर पर इन सवालों की चर्चा लगातार तेज हो रही है।लेकिन धार्मिक माहौल और भीड़ के बीच ये सवाल धीरे-धीरे दबते भी नजर आ रहे हैं।
धर्म की आड़ में इमेज मेकओवर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ धार्मिक सक्रियता नहीं, बल्कि “इमेज रिबिल्डिंग” का बड़ा अभियान भी हो सकता है। क्योंकि जब कोई चेहरा भ्रष्टाचार, गिरफ्तारी और आर्थिक अपराधों से जुड़ जाता है, तब सबसे आसान रास्ता होता है —“धर्म और समाजसेवा” की नई छवि गढ़ना।
प्रदेश में इससे पहले भी कई विवादित चेहरे धर्म और ट्रस्टों की आड़ लेकर अपनी सार्वजनिक स्वीकार्यता वापस पाने की कोशिश करते रहे हैं। अब उसी सूची में अशोक चतुर्वेदी का नाम भी तेजी से जोड़ा जा रहा है।
इंटरव्यू में करोड़ों के संकेत… सिस्टम को संदेश?
हाल के कुछ इंटरव्यू के हिस्सों ने राजनीतिक हलकों में और हलचल बढ़ा दी है। बताया जा रहा है कि बातचीत के दौरान सत्ता के भीतर कथित लेन-देन, करोड़ों की रकम और अंदरूनी समीकरणों को लेकर संकेत दिए गए। इन बयानों को अब सिर्फ इंटरव्यू नहीं, बल्कि “सिस्टम के भीतर का मैसेज” माना जा रहा है। यानी सवाल अब सिर्फ भ्रष्टाचार या धर्म का नहीं रहा। अब चर्चा इस बात की है कि क्या यह पूरा घटनाक्रम किसी बड़े दबाव, समझौते या राजनीतिक संतुलन का हिस्सा है?
फंडिंग पर भी उठ रहे बड़े सवाल
इतने विशाल धार्मिक आयोजन…
हजारों लोगों की व्यवस्था…
भव्य मंच…
वीआईपी आतिथ्य…
बड़े संतों की मौजूदगी…
और लगातार बढ़ता आश्रम नेटवर्क…
तो आखिर पैसा कहाँ से आ रहा है?
क्या ट्रस्ट की फंडिंग पूरी तरह पारदर्शी है?
क्या आर्थिक स्रोत सार्वजनिक हैं?
क्या जांच एजेंसियाँ कभी इस दिशा में भी देखेंगी?
इन सवालों ने अब पूरे मामले को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है।
सबसे बड़ा सवाल — सत्ता की मौजूदगी क्यों?
राजनीतिक गलियारों में अब सबसे तीखी चर्चा इसी बात की है कि जिन मामलों की जांच और फाइलें आज भी चर्चा में हैं, उसी व्यक्ति के मंच पर सत्ता के शीर्ष चेहरे आखिर क्यों दिखाई दिए?
क्या यह सिर्फ धार्मिक सम्मान था? या फिर इससे कोई राजनीतिक संदेश देने की कोशिश हुई?
कुछ लोग इसे “क्लीन चिट का संकेत” मान रहे हैं, तो कुछ इसे जांच एजेंसियों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की रणनीति बता रहे हैं।
रामकथा के मंच पर सत्ता, संत और सवाल
शिवरीनारायण में कथा चल रही थी।
मंच पर भजन गूंज रहे थे।
संत मौजूद थे।
सत्ता मौजूद रहे।
भक्तों की भीड़ मौजूद थी।
लेकिन उसी भीड़ के पीछे कहीं EOW की फाइलों की परछाई भी अब तक खड़ी दिखाई दे रही है।
कल तक जिनके नाम के साथ गिरफ्तारी, चार्जशीट और आर्थिक अपराधों की चर्चा होती थी, आज वही व्यक्ति आस्था और सेवा की नई छवि के साथ मंच पर खड़ा है।
अब प्रदेश देख रहा है…
क्या यह सचमुच आत्मिक परिवर्तन है? या फिर भ्रष्टाचार के पुराने दागों पर धर्म का नया रंग चढ़ाया जा रहा है?
क्या रामकथा की भीड़ में पुराने सवाल दब जाएंगे?
या फिर आने वाले दिनों में फाइलों की धूल फिर उड़ने वाली है?
छत्तीसगढ़ की राजनीति, सत्ता और संतों के इस संगम ने अब कई नए सवाल पैदा कर दिए हैं…
और उन सवालों का जवाब शायद आने वाला समय ही देगा।

