“कंधों पर सिस्टम की नाकामी: बीमार पत्नी को ‘जुगाड़ स्ट्रेचर’ पर ढोता पति, कब जागेगा स्वास्थ्य विभाग?”
रिपोर्ट – संजू गुप्ता
छत्तीसगढ़ – कबीरधाम जिले के ग्राम नगवाही से सामने आई एक तस्वीर न सिर्फ दिल को झकझोरती है, बल्कि उस पूरे सिस्टम पर करारा तमाचा भी है, जो कागजों में ‘बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं’ के दावे करता है। इस तस्वीर में एक बेबस पति—समलू मरकाम—अपनी गंभीर रूप से बीमार पत्नी को बचाने के लिए हर मुमकिन जुगाड़ करता नजर आ रहा है। लेकिन सवाल ये है कि आखिर 21वीं सदी के भारत में किसी को अपनी पत्नी को बाइक पर लकड़ी का पटिया बांधकर ‘स्ट्रेचर’ बनाकर क्यों ढोना पड़ रहा है?
समलू मरकाम की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की मजबूरी नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की विफलता की जीवंत तस्वीर है। पत्नी की हालत गंभीर है, इलाज के लिए पैसे खत्म हो चुके हैं, और सरकारी एंबुलेंस सेवा—जिसे जरूरत के वक्त जीवन रक्षक माना जाता है—यहां नदारद है। ऐसे में समलू ने अपनी मोटरसाइकिल को ही ‘अस्पताल’ बना लिया। बाइक में लकड़ी का पटिया बांधकर अस्थायी स्ट्रेचर तैयार किया और पत्नी को लेकर सैकड़ों किलोमीटर का सफर शुरू कर दिया।
एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक भटकते समलू की आंखों में सिर्फ एक उम्मीद है—कहीं तो इलाज मिल जाए। लेकिन यह उम्मीद हर मोड़ पर सिस्टम की लापरवाही से टकराकर टूटती नजर आती है। सवाल यह उठता है कि आखिर सरकार की योजनाएं जमीन पर क्यों नहीं उतर पा रही हैं? क्यों ‘108 एंबुलेंस सेवा’ जैसी सुविधाएं जरूरतमंदों तक समय पर नहीं पहुंचतीं?
यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उस सच्चाई को उजागर करती है जिसे अक्सर आंकड़ों और प्रेस कॉन्फ्रेंस के पीछे छिपा दिया जाता है। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं आज भी बदहाल हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर नहीं, दवाइयां नहीं, और न ही पर्याप्त संसाधन। ऐसे में गंभीर मरीजों को जिला अस्पताल या बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है, जो कई बार उनके लिए ‘मौत का सफर’ बन जाता है।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अक्सर यह दावा करते हैं कि हर गांव तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं, लेकिन नगवाही की यह तस्वीर उन दावों की सच्चाई बयां कर रही है। क्या विभाग के पास इस सवाल का जवाब है कि आखिर समलू को अपनी पत्नी को इस तरह ढोने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा? क्या यह उनकी जिम्मेदारी नहीं थी कि मरीज को समय पर एंबुलेंस और इलाज उपलब्ध कराया जाता?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह पहली घटना है? जवाब है, नहीं। देश के कई हिस्सों से ऐसी तस्वीरें बार-बार सामने आती रही हैं, जहां लोग अपने बीमार परिजनों को कंधों, ठेलागाड़ियों, या जुगाड़ वाहनों पर ढोते नजर आते हैं। हर बार कुछ दिनों तक हंगामा होता है, फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
समलू मरकाम का संघर्ष एक चेतावनी है—अगर अब भी सिस्टम नहीं जागा, तो ऐसी तस्वीरें आम होती जाएंगी। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है। जब एक पति अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए इस हद तक संघर्ष करता है और सिस्टम मूकदर्शक बना रहता है, तो यह लोकतंत्र के उस मूल सिद्धांत पर सवाल खड़ा करता है, जहां हर नागरिक को बुनियादी सुविधाएं देने का वादा किया गया है।
अब वक्त आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारी जवाब दें। क्या नगवाही जैसे गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं सिर्फ कागजों में ही रहेंगी? क्या गरीब और ग्रामीण लोगों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है? और आखिर कब तक लोग इस तरह ‘जुगाड़’ के भरोसे अपनी और अपने परिजनों की जान बचाने की कोशिश करते रहेंगे?
सरकार और स्वास्थ्य विभाग को इस घटना को एक ‘इंसिडेंट’ मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, बल्कि इसे एक चेतावनी के रूप में लेना चाहिए। जरूरत है तत्काल कार्रवाई की—गांव-गांव में एंबुलेंस की उपलब्धता सुनिश्चित हो, स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर और दवाइयां मौजूद हों, और सबसे जरूरी—ऐसी घटनाओं के लिए जवाबदेही तय हो।
क्योंकि अगर अब भी सिस्टम नहीं चेता, तो अगली तस्वीर शायद और भी भयावह होगी।

