लोकतंत्र पर लाठी: पत्रकार से मारपीट, सुशासन की सरकार खामोश
छत्तीसगढ़ – सारंगढ़ से सामने आई एक चौंकाने वाली घटना ने प्रदेश की कानून-व्यवस्था और तथाकथित ‘सुशासन’ की हकीकत को बेनकाब कर दिया है। यहां कृषि विभाग के कर्मचारियों द्वारा पत्रकार साथी पोसराम साहू की बेरहमी से पिटाई का मामला सामने आया है। घटना का CCTV फुटेज सामने आने के बाद भी अब तक आरोपियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना कई सवाल खड़े कर रहा है—क्या सरकारी कर्मचारियों को सत्ता का खुला संरक्षण प्राप्त है? क्या अब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी सुरक्षित नहीं?
पत्रकार पर हमला: सच्चाई दिखाने की सजा?
मिली जानकारी के अनुसार, पीड़ित पत्रकार एक स्थानीय मुद्दे की रिपोर्टिंग कर रहा था, जो कथित तौर पर कृषि विभाग की कार्यप्रणाली और अनियमितताओं से जुड़ा हुआ था। इसी दौरान विभाग के कुछ कर्मचारियों ने उस पर हमला कर दिया। वायरल हो रहे वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे कुछ लोग मिलकर पत्रकार को घेरते हैं और फिर उसके साथ मारपीट शुरू कर देते हैं।
यह कोई मामूली विवाद नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित हमला प्रतीत होता है—जहां सवाल पूछने की कीमत पत्रकार को अपनी जान जोखिम में डालकर चुकानी पड़ी।
CCTV और वीडियो सबूत—फिर भी कार्रवाई शून्य
घटना का CCTV फुटेज और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में हमलावरों के चेहरे साफ नजर आ रहे हैं, उनकी पहचान छुपी नहीं है। इसके बावजूद अब तक पुलिस या प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना बेहद चिंताजनक है।

आखिर क्यों?
किसके दबाव में है प्रशासन?
या फिर आरोपियों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है?
‘सुशासन’ की पोल खुली—सरकार पर सीधा सवाल
प्रदेश में सुशासन और कानून व्यवस्था को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन सारंगढ़ की यह घटना इन दावों की सच्चाई को उजागर करती है। जब सरकारी विभाग के कर्मचारी ही कानून हाथ में लेने लगें, तो आम जनता किस पर भरोसा करे?
यह घटना सिर्फ एक पत्रकार पर हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा प्रहार है। अगर पत्रकार ही सुरक्षित नहीं, तो जनता की आवाज कौन उठाएगा?
प्रशासन की चुप्पी—मौन या मिलीभगत?
घटना के बाद से प्रशासन की चुप्पी और भी ज्यादा सवाल खड़े कर रही है। न कोई बड़ा बयान, न कोई सख्त कार्रवाई—क्या यह मौन सहमति है? क्या यह संकेत है कि सत्ता के करीबी लोगों को कानून से ऊपर समझा जा रहा है? स्थानीय लोगों का भी कहना है कि इस तरह की घटनाएं अब आम होती जा रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है।
पत्रकार संगठनों में आक्रोश
इस घटना के बाद पत्रकार संगठनों में भारी आक्रोश है। कई संगठनों ने दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि इस मामले में जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा। पत्रकारों का साफ कहना है— “अगर हम सुरक्षित नहीं, तो लोकतंत्र सुरक्षित नहीं।”
कानून व्यवस्था पर बड़ा सवाल
यह घटना प्रदेश की कानून व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। क्या अब सरकारी कर्मचारी भी बिना किसी डर के हिंसा कर सकते हैं? क्या कानून सिर्फ आम जनता के लिए है? जब जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग ही नियमों की धज्जियां उड़ाने लगें, तो व्यवस्था पर भरोसा टूटना स्वाभाविक है।
सरकार के लिए चेतावनी
सारंगढ़ की यह घटना सरकार के लिए एक चेतावनी है। यदि समय रहते ऐसे मामलों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह प्रवृत्ति और बढ़ेगी। इससे न सिर्फ प्रशासन की साख गिरेगी, बल्कि लोकतंत्र की नींव भी कमजोर होगी।
डर के साये में लोकतंत्र
सारंगढ़ की यह घटना सिर्फ एक जिला या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह उस भयावह सच्चाई का आईना है, जहां सत्ता के संरक्षण में कानून को कुचला जा रहा है और आवाज उठाने वालों को चुप कराने की कोशिश की जा रही है।
अगर अब भी सरकार नहीं जागी, तो आने वाले समय में हालात और भी भयावह हो सकते हैं।

