जल जीवन मिशन पर बवाल—ठेकेदारों के भुगतान रुके, PHED पर दबाव और लापरवाही के गंभीर आरोप
रिपोर्ट – शशिकांत
खैरागढ़ – जल जीवन मिशन अब “हर घर जल” नहीं, बल्कि “हर घर टल” बनता नजर आ रहा है। जिस योजना का उद्देश्य हर घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाना है, वही योजना अब फाइलों, बहानों और प्रशासनिक लापरवाही के दलदल में फंसी हुई दिखाई दे रही है। PHED विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, और इन सवालों के केंद्र में हैं कार्यपालन अभियंता प्रदीप खलको।
पहले ही योजना की धीमी रफ्तार और जमीनी स्तर पर काम की सुस्ती को लेकर विभाग आलोचना झेल रहा था, लेकिन अब मामला और ज्यादा गंभीर हो गया है। आरोप है कि अपनी कमियों को छिपाने के लिए विभाग अब ठेकेदारों पर दबाव बनाने की नीति अपना रहा है। ठेकेदारों का कहना है कि शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि कार्य प्रगति के आधार पर कम से कम 70 प्रतिशत रनिंग बिल का भुगतान किया जाए, ताकि निर्माण कार्य बाधित न हो। लेकिन खैरागढ़ में इन निर्देशों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है।
स्थिति यह है कि जिन ठेकेदारों ने काम किया है, उन्हें उनके वैध भुगतान तक से वंचित रखा जा रहा है। सवाल सीधा है—जब भुगतान ही नहीं मिलेगा तो काम आगे कैसे बढ़ेगा? पाइपलाइन बिछाने, जल टंकियों के निर्माण और वितरण व्यवस्था को मजबूत करने जैसे जरूरी काम ठप पड़ने की कगार पर हैं। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि योजना को जानबूझकर कमजोर करने जैसा प्रतीत होता है।
स्थानीय स्तर पर अब यह चर्चा आम हो गई है कि यहां “पाइपलाइन से ज्यादा फाइलें बह रही हैं, और पानी से ज्यादा भुगतान अटका हुआ है।” यह व्यंग्य अपने आप में पूरी स्थिति की भयावह सच्चाई बयान करता है। जिस योजना से लोगों को राहत मिलनी थी, वही अब परेशानी का कारण बन रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर किसके संरक्षण में यह सब हो रहा है? एक अधिकारी किस भरोसे शासन के स्पष्ट निर्देशों को नजरअंदाज कर रहा है? क्या विभाग के भीतर कोई ऐसा ‘संरक्षण कवच’ है, जो जवाबदेही से बचाने का काम कर रहा है? यदि ऐसा है, तो यह केवल ठेकेदारों के अधिकारों का हनन नहीं, बल्कि सरकार की मंशा और उसकी साख पर भी सीधा प्रहार है।
जनप्रतिनिधियों और ठेकेदारों में आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। कई ठेकेदारों का कहना है कि भुगतान रोककर उन्हें आर्थिक रूप से दबाने की कोशिश की जा रही है, ताकि वे सवाल न उठाएं और चुपचाप काम करते रहें। लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि चुप रहना संभव नहीं है।
इस पूरे मामले में जिला प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। अब मांग उठ रही है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यह स्पष्ट किया जाए कि भुगतान क्यों रोका गया, किसके आदेश पर रोका गया और इसके पीछे असली वजह क्या है। साथ ही यह भी तय किया जाए कि जल जीवन मिशन को प्यासा बनाने के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है।
यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह योजना पूरी तरह से फेल हो सकती है। और तब “हर घर जल” का सपना खैरागढ़ में “हर घर छल” बनकर रह जाएगा। अब देखना यह है कि प्रशासन जागता है या फिर फाइलों में ही पानी बहता रहेगा और जनता प्यास से जूझती रहेगी।

