छत्तीसगढ़ में प्राइवेट स्कूल बंद का फ्लॉप शो! राजधानी रायपुर समेत बड़े शहरों में खुली रहीं स्कूलें, एसोसिएशन की अपील बेअसर
रायपुर – छत्तीसगढ़ में प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसियेशन द्वारा बुलाया गया एक दिवसीय स्कूल बंद पूरी तरह से बेअसर साबित हुआ। बड़े दावों और चेतावनियों के बावजूद राजधानी रायपुर सहित प्रदेश के कई प्रमुख शहरों—दुर्ग, बिलासपुर, भिलाई और कोरबा—में निजी स्कूल सामान्य दिनों की तरह खुले रहे। इस घटनाक्रम ने एसोसियेशन की ताकत और प्रभाव पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सुबह से ही जिस बंद को लेकर जोरदार माहौल बनाने की कोशिश की जा रही थी, वह जमीनी हकीकत में कहीं नजर नहीं आया। रायपुर में अधिकांश निजी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति सामान्य रही, वहीं शिक्षकों ने भी नियमित रूप से अपनी जिम्मेदारियां निभाईं। अभिभावकों ने भी बंद को लेकर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी और बच्चों को स्कूल भेजा।
वीडियो फुटेज और ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल परिसरों में पढ़ाई पूरी तरह जारी रही। कहीं भी बंद जैसा माहौल नहीं दिखा। न तो स्कूलों के गेट बंद थे और न ही किसी तरह का विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। यह साफ संकेत है कि एसोसियेशन की अपील को स्कूल संचालकों ने गंभीरता से नहीं लिया।
दुर्ग और भिलाई जैसे औद्योगिक शहरों में भी स्थिति अलग नहीं रही। यहां भी अधिकांश निजी स्कूल खुले रहे और कक्षाएं संचालित होती रहीं। बिलासपुर और कोरबा में भी यही हाल रहा, जहां बंद का असर नाममात्र का भी नहीं दिखा। कई स्कूल प्रबंधन ने साफ तौर पर कहा कि बच्चों की पढ़ाई को नुकसान पहुंचाना किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एसोसियेशन के अंदर ही एकरूपता की कमी है। एक तरफ संगठन बंद का आह्वान करता है, वहीं दूसरी ओर उसके सदस्य ही इसका पालन नहीं करते। इससे न केवल संगठन की साख कमजोर होती है, बल्कि सरकार और प्रशासन के सामने उनकी मांगें भी कमजोर पड़ जाती हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बंद का सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों को होता है। पहले से ही शिक्षा व्यवस्था कई चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे में बार-बार बंद का सहारा लेना सही रणनीति नहीं है। अभिभावकों ने भी इस बंद को गैर-जरूरी बताते हुए कहा कि बच्चों की पढ़ाई को राजनीति और दबाव की रणनीति से दूर रखा जाना चाहिए।
विकास तिवारी ने इस पूरे मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह बंद पूरी तरह से असफल रहा है और यह दिखाता है कि एसोसियेशन का जमीनी स्तर पर कोई प्रभाव नहीं है। उन्होंने कहा कि जब खुद स्कूल संचालक ही बंद का समर्थन नहीं कर रहे हैं, तो ऐसे आह्वान का कोई मतलब नहीं रह जाता।
अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर एसोसियेशन ने बिना पर्याप्त समर्थन के इतना बड़ा फैसला क्यों लिया? क्या यह सिर्फ दबाव बनाने की कोशिश थी या फिर संगठन के अंदर ही मतभेद हैं? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आ सकते हैं।
फिलहाल इतना तय है कि छत्तीसगढ़ में प्राइवेट स्कूल बंद का यह प्रयास पूरी तरह से फ्लॉप साबित हुआ है। इससे न केवल एसोसियेशन की रणनीति पर सवाल उठे हैं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता को भी झटका लगा है। आने वाले समय में संगठन को अपनी कार्यशैली और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर गंभीरता से विचार करना होगा, वरना ऐसे फ्लॉप शो आगे भी दोहराए जाते रहेंगे।

