“सिस्टम सोता रहा, पहाड़ों ने रोका रास्ता—25 किमी की जंग जीतकर पहली बार आलबेड़ा पहुंचा प्रशासन!”
रिपोर्ट – बिप्लव दत्ता
छत्तीसगढ़ – नारायणपुर जिले के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में बसे आलबेड़ा गांव तक आखिरकार प्रशासन पहुंच ही गया—लेकिन यह पहुंचना किसी सामान्य दौरे जैसा नहीं था, बल्कि 25 से 30 किलोमीटर के कठिन और जोखिम भरे सफर की कहानी बन गया। यह सफर बताता है कि आज़ादी के दशकों बाद भी कुछ गांव अब भी व्यवस्था से कितने दूर हैं।

कस्तूरमेटा से शुरू हुआ यह सफर न सिर्फ लंबा था, बल्कि बेहद चुनौतीपूर्ण भी। प्रशासनिक टीम को पहले उबड़-खाबड़ रास्तों से बाइक पर सफर करना पड़ा और फिर कई किलोमीटर पैदल चलकर पहाड़, नदी-नाले और संकरी पगडंडियों को पार करना पड़ा। इस कठिन यात्रा के बाद पहली बार प्रशासन आलबेड़ा गांव तक पहुंच सका।
इस पूरे अभियान का नेतृत्व नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने किया, जिन्होंने न सिर्फ इस दुर्गम क्षेत्र तक पहुंचकर इतिहास रचा, बल्कि वहां के ग्रामीणों से सीधे संवाद कर उनकी वर्षों पुरानी समस्याओं को भी सुना।

दुर्गम रास्ता: जहां सड़क नहीं, सिर्फ संघर्ष है
कस्तूरमेटा से आलबेड़ा तक का रास्ता किसी भी लिहाज से आसान नहीं है। यहां पक्की सड़क तो दूर, सामान्य कच्चे रास्ते भी पूरी तरह विकसित नहीं हैं। प्रशासनिक टीम को कई जगहों पर बाइक से उतरकर पैदल चलना पड़ा। घने जंगल, ऊंचे-नीचे पहाड़, बहते नदी-नाले और खतरनाक पगडंडियां—ये सब इस सफर का हिस्सा थे। कई जगहों पर नदी पार करने के लिए अस्थायी व्यवस्था का सहारा लेना पड़ा। यह वही इलाका है, जहां आज तक सरकारी योजनाएं कागजों से आगे नहीं बढ़ पाई थीं। यहां तक कि कई ग्रामीणों ने पहली बार किसी कलेक्टर को अपने गांव में देखा।

पहली बार गांव पहुंचा प्रशासन—ग्रामीणों में उत्साह
जैसे ही प्रशासनिक टीम आलबेड़ा पहुंची, ग्रामीणों में उत्साह और आश्चर्य का माहौल बन गया। पारंपरिक तरीके से ग्रामीणों ने कलेक्टर नम्रता जैन और उनकी टीम का स्वागत किया। ढोल-नगाड़ों, पारंपरिक नृत्य और स्थानीय रीति-रिवाजों के साथ स्वागत ने यह साफ कर दिया कि गांव के लोग वर्षों से इस दिन का इंतजार कर रहे थे। ग्रामीणों ने खुले दिल से प्रशासन का स्वागत किया और अपनी समस्याओं को साझा करने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र हुए।

पेज-भात के साथ प्रशासन और जनता का जुड़ाव
इस दौरे की सबसे खास बात यह रही कि कलेक्टर नम्रता जैन ने ग्रामीणों के साथ बैठकर पारंपरिक “पेज-भात” का भोजन किया। यह सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि प्रशासन और ग्रामीणों के बीच विश्वास और जुड़ाव का प्रतीक था। इससे यह संदेश गया कि प्रशासन सिर्फ आदेश देने नहीं, बल्कि लोगों के बीच रहने और उनकी जिंदगी को समझने भी आया है।

जनचौपाल में फूटा ग्रामीणों का दर्द
दौरे के दौरान जनचौपाल का आयोजन किया गया, जहां ग्रामीणों ने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं।
ग्रामीणों ने बताया कि:
गांव तक पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है
पीने के पानी की भारी समस्या है
बिजली की सुविधा या तो है नहीं, या बेहद सीमित है
शिक्षा के लिए स्कूलों की कमी है
स्वास्थ्य सेवाएं लगभग नदारद हैं
कई ग्रामीणों ने यह भी बताया कि बीमार होने पर उन्हें कई किलोमीटर पैदल चलकर इलाज के लिए जाना पड़ता है, जिससे कई बार जान का खतरा भी हो जाता है।
कलेक्टर के सख्त निर्देश—“अब बहाने नहीं चलेंगे”
ग्रामीणों की समस्याएं सुनने के बाद कलेक्टर नम्रता जैन ने मौके पर ही संबंधित अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि:
सड़क निर्माण को प्राथमिकता दी जाए
पेयजल की समस्या का तत्काल समाधान किया जाए
बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जाए
शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत किया जाए
कलेक्टर ने अधिकारियों को चेतावनी दी कि इस क्षेत्र की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी और तय समय सीमा में काम पूरा करना होगा।
व्यवस्था पर सवाल—अब तक क्यों नहीं पहुंचा सिस्टम?
यह दौरा कई बड़े सवाल भी खड़े करता है। आखिर क्यों आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी आलबेड़ा जैसे गांव प्रशासन की पहुंच से बाहर रहे?
क्या वजह है कि यहां सड़क, पानी, बिजली और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं अब तक नहीं पहुंच सकीं?

स्थानीय लोगों का कहना है कि चुनाव के समय नेता वादे तो करते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव को भूल जाते हैं।
विकास की नई उम्मीद या फिर एक और वादा?
कलेक्टर के इस दौरे के बाद गांव में विकास की उम्मीद जरूर जगी है। ग्रामीणों को भरोसा है कि अब उनकी समस्याओं का समाधान होगा।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह दौरा सिर्फ एक दिन की खबर बनकर रह जाएगा, या वास्तव में जमीनी स्तर पर बदलाव देखने को मिलेगा?
ग्रामीणों की मांग—“हमें भी मुख्यधारा में लाओ”
आलबेड़ा के ग्रामीणों ने एक ही मांग रखी—उन्हें भी बाकी दुनिया की तरह बुनियादी सुविधाएं दी जाएं। उन्होंने कहा कि वे भी विकास चाहते हैं, अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं और बेहतर जीवन जीना चाहते हैं।

एक दौरा, कई सवाल और उम्मीद की किरण
कस्तूरमेटा से आलबेड़ा तक का यह कठिन सफर सिर्फ एक प्रशासनिक दौरा नहीं, बल्कि सिस्टम की सच्चाई का आईना है। यह दिखाता है कि आज भी कई गांव विकास से कोसों दूर हैं। लेकिन साथ ही यह उम्मीद भी जगाता है कि अगर प्रशासन ठान ले, तो सबसे दुर्गम इलाके तक भी पहुंचा जा सकता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि कलेक्टर नम्रता जैन के इस दौरे के बाद आलबेड़ा गांव की तस्वीर बदलती है या नहीं।
क्योंकि अगर बदलाव नहीं आया, तो यह यात्रा सिर्फ एक “साहसिक कहानी” बनकर रह जाएगी—और ग्रामीणों की उम्मीदें फिर अधूरी रह जाएंगी।

