छत्तीसगढ़ में कोयला घोटाले का विस्फोट: रोज़ 150 करोड़ की लूट, सिस्टम बना साझेदार!
विशेष रिपोर्ट
रायपुर – छत्तीसगढ़ में कोयले का काला खेल अब सिर्फ चर्चा नहीं, बल्कि एक बड़े संगठित सिंडिकेट के रूप में सामने आ रहा है। खदानों से लेकर रेलवे साइडिंग, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क और प्लांट तक फैले इस पूरे तंत्र में बड़े स्तर पर अनियमितताओं और कथित भ्रष्टाचार के आरोप सामने आ रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे खेल से राज्य और केंद्र को प्रतिदिन करीब 150 करोड़ रुपए तक का नुकसान हो रहा है, जो किसी भी दृष्टि से चौंकाने वाला आंकड़ा है।

खदानों से शुरू होकर साइडिंग तक पहुंचता है खेल
राज्य की प्रमुख कोयला खदानें—मानिकपुर, गेवरा, कुसमुण्डा, राजमार्ग, ढेलवाडीह, सिंघाली सहित कई अन्य खदानों में कथित तौर पर एक ही पैटर्न पर काम किया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, खदान से कोयला निकालने के बाद उसे मालगाड़ियों में लोड किया जाता है, लेकिन यहां से ही गड़बड़ी शुरू हो जाती है।
सूत्र बताते हैं कि मालगाड़ी के डिब्बों में तय सीमा से अधिक कोयला भरा जाता है, जिससे कागजों और वास्तविक वजन में अंतर पैदा होता है। इसके बाद जब रेक को साइडिंग—विशेषकर कोरबा के मानिकपुर साइडिंग—पर लाया जाता है, तब “रेक रिवीलिंग” के नाम पर असली खेल शुरू होता है।
साइडिंग पर होता है असली ‘मैनेजमेंट’
मानिकपुर साइडिंग को इस पूरे नेटवर्क का “हब” बताया जा रहा है। यहां मालगाड़ी के डिब्बों से अतिरिक्त कोयला निकाल लिया जाता है और उसे ट्रकों व हाइवा में लोड कर दिया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया कथित तौर पर “कागजी रूप से वैध” दिखाते हुए की जाती है।
धर्मकांटे (वजन मापने की व्यवस्था) के माध्यम से इस कोयले को वैध तरीके से प्लांट तक पहुंचाया जाता है, जिससे यह चोरी न होकर “कानूनी ट्रांसपोर्ट” का रूप ले लेता है। यही कारण है कि इस पूरे खेल को पकड़ पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

“पांच नाम” और बड़ा नेटवर्क—मास्टरमाइंड कौन?
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे सिंडिकेट के पीछे पांच प्रमुख लोगों—सिंह, महतो, तिवारी, जायसवाल और मिश्रा—के नाम सामने आ रहे हैं। इन्हें प्रदेश के कोयला कारोबार का “मास्टरमाइंड” बताया जा रहा है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो पाई है।
बताया जा रहा है कि इन पांचों के नेटवर्क में खदान अधिकारियों, रेलवे कर्मियों, ट्रांसपोर्टरों, ब्यूरोक्रेसी के कुछ हिस्सों और राजनीतिक संरक्षण तक की भूमिका होने की आशंका जताई जा रही है। यही वजह है कि यह पूरा खेल वर्षों से बिना किसी बड़े व्यवधान के चलता आ रहा है।
पहले भी सामने आ चुका है बड़ा घोटाला
यह कोई पहला मामला नहीं है जब छत्तीसगढ़ में कोयला परिवहन को लेकर सवाल उठे हों। पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी प्रति टन 25 रुपए की अवैध वसूली का बड़ा मामला सामने आया था। उस समय इस घोटाले में कई बड़े अधिकारियों, IAS अफसरों और नेताओं के नाम सामने आए थे और कुछ गिरफ्तारियां भी हुई थीं।
उस मामले के बाद सख्ती की उम्मीद थी, लेकिन वर्तमान हालात को देखकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या सिस्टम में सुधार हुआ या फिर खेल और भी संगठित हो गया?
उद्योगों तक पहुंच रहा “संदिग्ध कोयला”
सूत्रों के मुताबिक, साइडिंग से निकाला गया अतिरिक्त कोयला सीधे उद्योगों और प्लांटों तक पहुंचता है। यह कोयला ट्रांसपोर्टरों के जरिए भेजा जाता है और कागजों में सब कुछ “नियमों के अनुसार” दिखाया जाता है।
इससे न केवल सरकार को राजस्व का भारी नुकसान होता है, बल्कि ईमानदार व्यापारियों और कंपनियों के लिए भी असमान प्रतिस्पर्धा की स्थिति बनती है।
इतने बड़े स्तर पर हो रहे इस कथित घोटाले ने सरकार की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा है कि बिना राजनीतिक संरक्षण के इतना बड़ा नेटवर्क संभव नहीं है।
हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक इस पूरे मामले पर कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन अगर सूत्रों के दावे सही हैं, तो यह राज्य के इतिहास के सबसे बड़े कोयला घोटालों में से एक साबित हो सकता है।

इस पूरे मामले को लेकर अब जांच की मांग तेज हो गई है। सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने उच्च स्तरीय जांच एजेंसी से जांच कराने की मांग की है। साथ ही, इसमें शामिल अधिकारियों और संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की भी बात कही जा रही है।
छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था में कोयले की अहम भूमिका है, लेकिन अगर इसी क्षेत्र में इस तरह की अनियमितताएं और भ्रष्टाचार के आरोप सामने आते हैं, तो यह न सिर्फ आर्थिक नुकसान है बल्कि शासन व्यवस्था की साख पर भी बड़ा सवाल है।
अब देखना यह होगा कि सरकार इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाती है—क्या यह सिर्फ आरोपों तक सीमित रहेगा या फिर वाकई में कोई बड़ी कार्रवाई देखने को मिलेगी।

