April 23, 2026

बिग ब्रेकिंग: 314 अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप… EOW के हाथ बंधे! धारा 17(क) बना ‘सिस्टम का सुरक्षा कवच’ या जांच का गला घोंटने वाला फंदा?

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रायपुर : छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई अब सवालों के घेरे में है। आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) के पास 314 अधिकारियों के खिलाफ गंभीर शिकायतें लंबित होने का सनसनीखेज खुलासा हुआ है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इनमें से एक भी मामले में ठोस जांच आगे नहीं बढ़ पाई है। वजह—अनुमति का ऐसा जाल, जिसने पूरी जांच प्रक्रिया को जकड़ कर रख दिया है।

मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को सौंपे गए एक विस्तृत आवेदन में यह दावा किया गया है कि EOW के पास बड़ी संख्या में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की फाइलें तैयार पड़ी हैं। कई मामलों में प्रारंभिक जांच भी पूरी हो चुकी है, दस्तावेजों का परीक्षण हो चुका है, लेकिन अंतिम जांच की प्रक्रिया शुरू करने के लिए जरूरी अनुमति अब तक नहीं मिल सकी है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गई है?

धारा 17(क): जांच की राह में सबसे बड़ी रुकावट

आवेदन में सबसे गंभीर आरोप भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17(क) को लेकर लगाया गया है। इस प्रावधान के तहत किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले संबंधित विभाग से अनुमति लेना अनिवार्य है। यहीं से पूरी प्रक्रिया अटक जाती है।
आलोचकों का कहना है कि यह प्रावधान अब “सुरक्षा कवच” बन चुका है, जिसका इस्तेमाल जांच को रोकने के लिए किया जा रहा है। नतीजा यह है कि शिकायतें दर्ज होती हैं, फाइलें बनती हैं, दस्तावेज जुटते हैं—लेकिन जांच शुरू ही नहीं होती।

314 शिकायतें… लेकिन कार्रवाई शून्य

आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। 314 अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें लंबित हैं। इनमें कई ऐसे मामले हैं, जिनमें प्रारंभिक जांच पूरी हो चुकी है और पर्याप्त सबूत भी मौजूद हैं। बावजूद इसके, एक भी मामले में व्यापक जांच शुरू नहीं हो पाई है।

यह सिर्फ प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की निष्क्रियता और जवाबदेही की कमी को उजागर करता है। सवाल उठ रहा है कि जब सबूत मौजूद हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

जिस पर आरोप, वही देगा अनुमति!

इस पूरे मामले का सबसे विवादास्पद पहलू यही है कि जिन अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, उन्हीं के विभाग से जांच की अनुमति लेनी पड़ती है। यानी अनुमति देने वाला भी वही सिस्टम है, जिस पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

ऐसे में निष्पक्ष जांच की उम्मीद करना कितना उचित है? यह व्यवस्था खुद ही अपनी जांच को रोकने का जरिया बनती जा रही है। यही कारण है कि शिकायतकर्ता और सामाजिक संगठनों में भारी नाराजगी है।

बड़े अफसर भी घेरे में

यह मामला सिर्फ छोटे कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। आवेदन में दावा किया गया है कि IAS, IPS और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शिकायतों के दायरे में हैं। इसका मतलब साफ है—भ्रष्टाचार का मुद्दा अब निचले स्तर से ऊपर उठकर सिस्टम के शीर्ष तक पहुंच चुका है।

जब शीर्ष स्तर के अधिकारियों पर आरोप हों और जांच ही शुरू न हो सके, तो पारदर्शिता और सुशासन के दावे अपने आप कमजोर पड़ जाते हैं।

पारदर्शिता पर गंभीर सवाल

फाइलें तैयार हैं, दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन अनुमति नहीं है—यह स्थिति सीधे तौर पर सरकार के पारदर्शिता मॉडल पर सवाल खड़े करती है। क्या यह महज प्रक्रिया की जटिलता है या फिर जानबूझकर बनाई गई ऐसी व्यवस्था, जो भ्रष्टाचार के मामलों को दबाने में मदद करती है?
जवाबदेही की कमी साफ दिखाई देती है। न जांच आगे बढ़ रही है, न ही किसी अधिकारी पर कार्रवाई हो रही है। इससे जनता का भरोसा भी कमजोर पड़ रहा है।

सरकार से सीधी मांग

आवेदन में सरकार से साफ मांग की गई है कि धारा 17(क) की अनुमति प्रक्रिया को सरल बनाया जाए। इसके लिए एक तय समयसीमा निर्धारित की जाए, ताकि जांच अनिश्चितकाल तक लंबित न रहे।

साथ ही यह भी मांग की गई है कि विभागों को स्पष्ट निर्देश दिए जाएं कि वे जांच की अनुमति देने में अनावश्यक देरी न करें और पारदर्शिता बनाए रखें। EOW को स्वतंत्र रूप से जांच शुरू करने का अधिकार देने की भी जरूरत बताई गई है।

चेतावनी: नहीं बदली व्यवस्था तो दब जाएंगी फाइलें

आवेदन में यह चेतावनी भी दी गई है कि यदि वर्तमान व्यवस्था में बदलाव नहीं किया गया, तो भ्रष्टाचार के मामलों की जांच हमेशा फाइलों में ही दबकर रह जाएगी। यह सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बन चुका है।

अब सरकार के सामने बड़ी चुनौती

छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अब एक “टेस्ट केस” बन गई है। एक तरफ 314 शिकायतों का पहाड़ खड़ा है, तो दूसरी तरफ अनुमति का ताला लगा हुआ है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सरकार इस ताले को तोड़ पाएगी? क्या जांच एजेंसियों को स्वतंत्रता मिलेगी? या फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ कागजों और फाइलों तक ही सीमित रह जाएगी?

फिलहाल पूरा प्रदेश इस जवाब का इंतजार कर रहा

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