March 12, 2026

छत्तीसगढ़ भाजपा में अंदरखाने नाराज़गी! कार्यकर्ताओं की दबी जुबान— “न पद मिला, न सम्मान… अफीम की खेती को ही लाइसेंस दे दे सरकार”

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खास रिपोर्ट – बिप्लव दत्ता

रायपुर। छत्तीसगढ़ में सत्ता में आने के बाद जहां एक ओर सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाने में लगी है, वहीं दूसरी ओर सत्ताधारी Bharatiya Janata Party (भाजपा) के भीतर ही अंदरखाने नाराज़गी की सुगबुगाहट तेज होती दिखाई दे रही है। पार्टी के कई जमीनी कार्यकर्ता दबी जुबान में अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं।

विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, भाजपा के कई पुराने कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने पूरी ताकत लगाकर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनवाई, लेकिन सरकार बनने के करीब दो साल बाद भी उन्हें न कोई जिम्मेदारी मिली और न ही अपेक्षित मान-सम्मान।

एक कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हम लोगों ने दम-खम से सरकार बनवाई। उम्मीद थी कि सरकार बनने के बाद कार्यकर्ताओं को पद, प्रतिष्ठा और काम मिलेगा। लेकिन दो साल बीत गए, हालात वैसे ही हैं। अब कार्यकर्ता खुलकर बोल नहीं पा रहे, पर अंदरखाने नाराजगी जरूर है।”

कुछ कार्यकर्ताओं ने तो यहां तक कह दिया कि पिछली कांग्रेस सरकार के समय कम से कम कार्यकर्ताओं को सम्मान तो मिलता था।

अफीम खेती पर भी चर्चा

इसी बीच कार्यकर्ताओं के बीच एक और चर्चा जोरों पर है। प्रदेश में हाल के दिनों में सामने आए अफीम खेती के मामलों को लेकर भी पार्टी के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं।

एक कार्यकर्ता ने दबी जुबान में कहा कि जब प्रदेश में कई जगह अफीम की खेती की चर्चा हो रही है और उसमें कथित तौर पर राजनीतिक लोगों के नाम सामने आ रहे हैं, तो सरकार को इस पर स्पष्ट नीति बनानी चाहिए।

उसका कहना था— “अगर सरकार अफीम की खेती को सीमित लाइसेंस के साथ अनुमति दे दे, जैसे एक व्यक्ति को पांच एकड़ तक, तो किसान और कार्यकर्ता दोनों अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं और सरकार को राजस्व भी मिलेगा।”

पद नहीं चाहिए, खेती करने दो”


कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर ऐसी व्यवस्था हो जाए तो वे पार्टी से पद या जिम्मेदारी की मांग भी नहीं करेंगे।

एक कार्यकर्ता ने कहा— “सरकार लाइसेंस दे दे, हम पार्टी से न पद मांगेंगे और न काम… खेती करेंगे और अपनी आर्थिक व्यवस्था मजबूत करेंगे। छत्तीसगढ़ को बनाने-संवारने का काम भी हम ही करेंगे।”

हालांकि यह चर्चाएं फिलहाल खुले मंच पर नहीं बल्कि बंद कमरों और कार्यकर्ताओं के बीच ही चल रही हैं। लेकिन यह जरूर साफ है कि सत्ता में आने के बाद भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच उम्मीद और हकीकत के अंतर को लेकर असंतोष की हल्की-हल्की आंच सुलगती दिखाई दे रही है।

अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में यह अंदरखाने की नाराजगी खुलकर सामने भी आ सकती है।

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