राजधानी में पत्रकारों की सुरक्षा पर हमला!भूमाफिया के गुर्गों की खुलेआम धमकी, ‘सुशासन’ के दावे कटघरे में*
( रिपोर्ट – बिप्लव दत्ता ) रायपुर – छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अब सच लिखना जानलेवा होता जा रहा है। अवैध जमीन मामलों पर सवाल उठाने वाले पत्रकार देवेश तिवारी को जमीन माफिया से जुड़े व्यक्ति द्वारा सोशल मीडिया पर जान से मारने की धमकी दी गई है। धमकी का वीडियो सामने आने के बाद यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक सत्ता और प्रशासन की चुप्पी बनी हुई है। यह घटना सिर्फ एक पत्रकार को डराने की कोशिश नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीधा और खुला हमला है।
रील बनाकर धमकी, प्रेस क्लब तक गुर्गों की दस्तक
जानकारी के मुताबिक, भूमाफिया बसंत अग्रवाल से जुड़े लोग कभी सोशल मीडिया पर रील बनाकर पत्रकार को धमका रहे हैं, तो कभी रायपुर प्रेस क्लब पहुँचकर देवेश तिवारी के घर और दफ्तर का पता पूछते फिर रहे हैं। सवाल यह है कि— क्या अब प्रेस क्लब भी सुरक्षित नहीं है… क्या पत्रकारों की जानकारी खुलेआम इकट्ठा करना अपराध नहीं?

‘सुशासन’ में पत्रकार असुरक्षित
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के तथाकथित सुशासन में अब हालात ऐसे हैं कि पत्रकार भी खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर रहे। जमीन माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे न कैमरे से डरते हैं, न कानून से। इतना संरक्षण किसका?
बड़ा सवाल यही है कि—इस भूमाफिया को इतना संरक्षण आखिर कौन दे रहा है….जिसके गुर्गे खुलेआम धमकी दें, वीडियो बनाएं, प्रेस क्लब तक पहुँच जाएँ—और प्रशासन मूकदर्शक बना रहे।
राजनीतिक पहचान और ‘छवि चमकाने’ का खेल
बताया जाता है कि बसंत अग्रवाल भाजपा से जुड़ा रहा है, उसने भाजपा से टिकट की मांग की थी। टिकट न मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़ा, लेकिन जनता ने उसे सिरे से नकार दिया। इसके बावजूद सामाजिक स्वीकार्यता पाने के लिए वह साल में दो–तीन बार कथा वाचक बुलवाकर खुद को ‘यूथ आइकॉन’ साबित करने की कोशिश करता रहता है।

क्या कथाओं से जमीन माफियागिरी धुल जाती है?
क्या धमकी देने वाले ‘यूथ आइकॉन’ कहलाएंगे?
पत्रकार देवेश तिवारी को धमकी देना सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, यह लोकतंत्र की आवाज को दबाने की कोशिश है। छत्तीसगढ़ में कानून का राज है या भूमाफिया का।

