छत्तीसगढ़ में ‘मुसवा’ बना सियासी ट्रेंड!धान घोटाले से लेकर सरकार की बदनामी तक—हर जगह मुसवा ही मुसवा
( रिपोर्ट – बिप्लव दत्ता )रायपुर – छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक अजीब लेकिन गंभीर नाम गूंज रहा है— ‘मुसवा’। सरकारी फाइलों से लेकर सियासी बहसों तक, हर सवाल का जवाब अब मुसवा बनता जा रहा है। प्रदेश में करोड़ों रुपये के धान के गायब होने का मामला सामने आते ही जिम्मेदार अफसरों ने हैरान करने वाला तर्क दिया—
👉 धान मुसवा खा गया!
धान निगल गया मुसवा या सिस्टम? एक तरफ भाजपा सरकार बड़े पैमाने पर धान खरीदी का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर गोदामों से धान रहस्यमय तरीके से गायब हो रहा है। जांच के नाम पर जिम्मेदारी तय करने की बजाय अफसरों ने सारा दोष मुसवा पर डाल दिया।
सरकार बदनाम, विपक्ष को फायदा
इस पूरे घटनाक्रम ने भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
विपक्ष को बैठे-बिठाए बड़ा मुद्दा मिल गया है। अब हालात ऐसे हैं कि विपक्ष प्रदेश भर में “मुसवा की तलाश” में निकल पड़ा है।
अफसर बनाम मुसवा
सवाल सीधे हैं— क्या सच में करोड़ों का धान मुसवा खा गया? या फिर घोटाले को छुपाने के लिए मुसवा को ढाल बनाया जा रहा है?
जिम्मेदार अधिकारी खामोश क्यों हैं? जनता पूछ रही है…अगर मुसवा ही इतना बड़ा गुनहगार है, तो अब तक उस पर कार्रवाई क्यों नहीं? या फिर मुसवा सिर्फ एक बहाना है, असली खेल कहीं और चल रहा है…छत्तीसगढ़ में धान खरीदी के बीच मुसवा अब सिर्फ जानवर नहीं,
बल्कि सिस्टम की नाकामी और जवाबदेही से बचने का प्रतीक बनता जा रहा है।

