भारत माला परियोजना: विकास या विनाश? केशकाल–कांकेर के जंगलों में सुरंग, करोड़ों खर्च… लेकिन सवाल बेहिसाब
( रिपोर्ट – बिप्लव दत्ता ) रायपुर – भारत माला परियोजना के तहत रायपुर के अभनपुर से विशाखापट्नम तक बनाई जा रही इकोनॉमिक कॉरिडोर सिक्सलेन सड़क को विकास की बड़ी उपलब्धि बताकर प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
केशकाल और कांकेर वन परिक्षेत्र के बसनवाही–मरांगपुरी क्षेत्र में 2.79 किलोमीटर लंबी सुरंग घने जंगलों, पहाड़ियों और वन संपदा को काटकर बनाई जा रही है। क्या यह सच में “न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव” वाला प्रोजेक्ट है या फिर विकास के नाम पर प्रकृति से समझौता?

एनएचएआई के अधिकारी भले ही इसे छत्तीसगढ़ की कनेक्टिविटी और लौह अयस्क परिवहन के लिए अहम बता रहे हों, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह परियोजना सवालों के घेरे में है। 16491 करोड़ रुपये की लागत वाली इस सड़क में सिर्फ छत्तीसगढ़ हिस्से पर ही 4146 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, फिर भी कई बुनियादी सवालों के जवाब नदारद हैं।
एलिफेंट अंडरपास: करोड़ों खर्च, ज़मीनी सच्चाई शून्य
सबसे बड़ा सवाल एलिफेंट अंडरपास को लेकर है। स्थानीय लोगों और जानकारों का दावा है कि इस इलाके में पिछले 25–30 साल में सिर्फ एक बार हाथी के पैरों के निशान पाए गए थे। उसके बाद न तो हाथी दिखे और न ही कोई नियमित मूवमेंट दर्ज हुई। इसके बावजूद करोड़ों रुपये खर्च कर एलिफेंट अंडरपास बनाया जा रहा है।
क्या यह पर्यावरण संरक्षण है या फिर सिर्फ कागज़ी खानापूर्ति?

बंदरों के लिए ब्रिज भी सवालों में
इसी तरह बंदरों के लिए बनाए जा रहे ब्रिज को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। न तो इनके उपयोग का कोई ठोस अध्ययन सार्वजनिक किया गया है और न ही यह बताया गया है कि वास्तव में इनकी जरूरत कैसे तय की गई। क्या यह भी सिर्फ बजट बढ़ाने का जरिया है?
गांव गायब, बोर्ड नदारद
जिस सड़क को आदिवासी और पिछड़े इलाकों की जीवनरेखा बताया जा रहा है, उसी सड़क पर यह तक साफ नहीं है कि वह कौन-कौन से गांवों से गुजर रही है। मार्ग पर गांवों के नाम और दिशा बताने वाले सूचक बोर्ड तक नहीं लगाए गए हैं। क्या यह परियोजना स्थानीय लोगों के लिए है या सिर्फ ट्रांजिट कॉरिडोर बनकर रह जाएगी?
जंगल कटे, जवाब नहीं
केशकाल और कांकेर के घने जंगलों में पहाड़ काटे जा रहे हैं, सुरंगें बनाई जा रही हैं, लेकिन पर्यावरणीय नुकसान का स्वतंत्र और पारदर्शी आकलन सार्वजनिक नहीं किया गया। विकास की रफ्तार के साथ जंगल, वन्यजीव और स्थानीय समुदाय कहां खड़े हैं—इस पर चुप्पी क्यों?

सवाल यह नहीं कि सड़क बने या नहीं, सवाल यह है—किस कीमत पर?
सिक्सलेन सड़क से यात्रा समय जरूर घटेगा, लेकिन क्या इसके बदले जंगलों की कुर्बानी, अनावश्यक संरचनाओं पर करोड़ों का खर्च और स्थानीय हितों की अनदेखी जायज़ है? भारत माला परियोजना में योजना, पर्यावरण और पारदर्शिता—तीनों पर अब जवाब देना जरूरी हो गया है।

