मुख्यमंत्री के निर्देश को ठेंगा! रेत माफिया के आगे छत्तीसगढ़ सरकार ‘फेल’, करोड़ों का राजस्व चूना*
( रिपोर्ट – बिप्लव दत्ता ) रायपुर : छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने कलेक्टर्स कॉन्फ्रेंस में साफ निर्देश दिए थे कि प्रदेश में किसी भी सूरत में रेत का अवैध उत्खनन नहीं होना चाहिए। मगर, मुख्यमंत्री के ये सख्त आदेश रायपुर से महज 50 किलोमीटर दूर राजिम-नवापारा क्षेत्र में पूरी तरह बेअसर साबित हो रहे हैं। महानदी के तट पर, रेत माफिया बेखौफ होकर अवैध खनन को अंजाम दे रहे हैं, जिससे न सिर्फ राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है, बल्कि नदी के पर्यावरण को भी गंभीर क्षति पहुँच रही है।
नियमों को ताक पर रखकर ‘ट्रैक्टर’ से हो रहा परिवहन
इस समय प्रदेश में वर्षाकाल के चलते रेत खनन पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध लगा हुआ है। इसके बावजूद, नवापारा से कुछ ही किलोमीटर दूर ग्राम लखना की रेत खदान में अवैध उत्खनन चरम पर है। हमारी पड़ताल में सामने आया कि खनन माफिया, जिनमें पारागाँव के पूर्व सरपंच और ‘सोनकर बंधु’ शामिल हैं, बड़ी हाईवा गाड़ियों का उपयोग करने के बजाय कृषि में इस्तेमाल होने वाले छोटे ट्रैक्टरों के माध्यम से रेत की अवैध सप्लाई कर रहे हैं। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि पुलिस और खनिज विभाग की नियमित चेकिंग से बचा जा सके।

ग्राउंड रिपोर्ट: ‘रेत चाहिए तो मिल जाएगी, मोटा, पतला और बारीक’
हमारे संवाददाता ने ग्राउंड ज़ीरो पर पहुँचकर स्थिति का जायजा लिया और रेत परिवहन कर रहे ड्राइवरों से बात की। जब संवाददाता ने पूछा कि अभी तो रेत खनन बंद है, तो ड्राइवरों का बेखौफ जवाब था: “बंद नहीं है। आपको रेत चाहिए तो मिल जाएगी। मोटा, पतला और बारीक… सब उपलब्ध है।”
पूछे जाने पर कि अभी जो तीन ट्रैक्टर में माल भरा है, वह कहाँ जा रहा है, ड्राइवर ने बताया कि यह नवापारा-राजिम के लिए ऑर्डर है, लेकिन वे रायपुर तक के लिए भी सप्लाई कर सकते हैं। यह बातचीत साफ दर्शाती है कि अवैध खनन का यह कारोबार कितनी धड़ल्ले से और खुलेआम फल-फूल रहा है।
CM के आदेश बनाम स्थानीय ‘संरक्षण’: किसकी ताकत बड़ी?
यह गंभीर सवाल सीधे छत्तीसगढ़ सरकार की मंशा और उसके प्रशासनिक नियंत्रण पर खड़े करता है:
प्रशासनिक नाकामी: क्या खनिज अधिकारियों और स्थानीय पुलिस को वास्तव में दिन-दहाड़े हो रहे इस उत्खनन की भनक नहीं है? या फिर वे ‘मिलीभगत’ के चलते आँखें मूंदे हुए हैं?
राजनीतिक संरक्षण: रिपोर्ट के अनुसार, रेत माफिया इतने बेखौफ इसलिए हैं क्योंकि उन्हें स्थानीय स्तर पर बड़ा संरक्षण प्राप्त है। क्या यह संरक्षण स्थानीय विधायक या सत्ताधारी दल के प्रभावशाली गुर्गों का है, जिसके सामने खनिज अधिकारी कार्रवाई करने से डर रहे हैं।

राजस्व का नुकसान: प्रतिबंध के बावजूद हो रहे इस अवैध खनन से राज्य के खजाने को लाखों-करोड़ों रुपए का राजस्व नुकसान हो रहा है, जो सीधे-सीधे सरकारी खजाने में जाना चाहिए था।
विपक्ष हमलावर: ‘अवैध खनन पर कार्रवाई न होना सरकार की विफलता’
राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे पर उबाल है। विपक्ष का आरोप है कि अवैध खनन पर मुख्यमंत्री के निर्देश केवल कागजों तक सीमित हैं। स्थानीय माफिया को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है, जिसके चलते अधिकारी कार्रवाई करने से कतरा रहे हैं। यह स्थिति न सिर्फ सरकार के सुशासन के दावे पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि महानदी की पारिस्थितिकी को भी अपूरणीय क्षति पहुँचा रही है।
अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री के सख्त तेवर कब जमीन पर उतरते हैं, या फिर रेत माफिया का यह ‘काला खेल’ स्थानीय प्रशासन की मौन सहमति से यूँ ही चलता रहेगा।

