June 30, 2026

महासमुंद गैस घोटाले का सबसे बड़ा खुलासा: जिला खाद्य अधिकारी ही निकला 1.5 करोड़ की लूट का मास्टरमाइंड!

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छत्तीसगढ़ – महासमुंद जिले में सामने आए करोड़ों रुपये के गैस घोटाले ने पूरे प्रशासनिक महकमे में भूचाल ला दिया है। जिस अधिकारी पर जनता को राहत और खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, वही करोड़ों के खेल का सरगना निकला। पुलिस जांच में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि 1.5 करोड़ रुपये के एलपीजी गैस गबन कांड का मास्टरमाइंड खुद जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव है। इस मामले का खुलासा पुलिस अधीक्षक प्रभात कुमार की अगुवाई में हुई गहन जांच के बाद हुआ, जिसके बाद पूरे प्रदेश में हड़कंप मच गया है।

पुलिस के मुताबिक, अजय यादव ने गौरव गैस एजेंसी के संचालक पंकज चंद्राकर और रायपुर निवासी मनीष चौधरी के साथ मिलकर इस पूरे षड्यंत्र को अंजाम दिया। आरोपियों ने योजनाबद्ध तरीके से 6 एलपीजी कैप्सूलों को निशाना बनाया और उनमें मौजूद करीब 102 मीट्रिक टन गैस को ठिकाने लगाने की साजिश रची। इस गैस को बाजार में बेचकर लगभग 1 करोड़ रुपये की अवैध कमाई करने का पूरा प्लान तैयार किया गया था।

जांच में सामने आया कि आरोपियों ने 6 एलपीजी कैप्सूलों से करीब 92 टन गैस चोरी-छिपे निकलवा ली। इसके बाद अपने अपराध को छिपाने के लिए कैप्सूलों का दोबारा वजन कराया गया ताकि रिकॉर्ड में कोई गड़बड़ी न दिखे। इतना ही नहीं, पूरे खेल को दबाने के लिए फर्जी पंचनामा तक तैयार किया गया और उसे कलेक्टोरेट में जमा कर दिया गया। इस दस्तावेज के जरिए प्रशासन और जांच एजेंसियों को भ्रमित करने की कोशिश की गई।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव ने खुद पुलिस और प्रशासनिक कर्मचारियों को गुमराह किया। उसने दावा किया कि गैस कैप्सूलों में लीकेज था और इसी कारण गैस कम हुई। लेकिन जब पुलिस ने तकनीकी जांच कराई तो सच्चाई सामने आ गई। जांच में साफ हो गया कि कैप्सूलों में किसी प्रकार का कोई लीकेज नहीं था। यानी पूरी कहानी सिर्फ करोड़ों की चोरी छिपाने के लिए गढ़ी गई थी।

पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि चोरी की गई गैस को बेचने के लिए कई एजेंसियों से संपर्क किया गया। आखिरकार ठाकुर पेट्रोकेमिकल के साथ करीब 80 लाख रुपये में सौदा तय हुआ। इस अवैध कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा खुद जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव को मिला। पुलिस के मुताबिक, डील के तहत अजय यादव ने 50 लाख रुपये अपने हिस्से में लिए। वहीं गौरव गैस एजेंसी संचालक पंकज चंद्राकर को 20 लाख रुपये और मनीष चौधरी को 10 लाख रुपये दिए गए। बाकी रकम इस पूरे नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों के बीच बांटी गई।

इस खुलासे के बाद सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इतने बड़े स्तर पर गैस की चोरी और फर्जीवाड़ा बिना प्रशासनिक संरक्षण के कैसे संभव हो सकता था। जिला स्तर का अधिकारी खुद इस खेल का सरगना निकला, इससे पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अब यह आशंका भी जताई जा रही है कि इस घोटाले में कई और बड़े नाम शामिल हो सकते हैं।

पुलिस ने इस मामले में अब तक तीन मुख्य आरोपियों – जिला खाद्य अधिकारी अजय कुमार यादव, गौरव गैस एजेंसी संचालक पंकज चंद्राकर और मनीष चौधरी को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं दो अन्य आरोपी अभी फरार बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश में पुलिस लगातार दबिश दे रही है। आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की गंभीर धाराओं 316(3), 316(5), 61, 238, 336(3), 338, 340(2) के साथ-साथ आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 3 और 7 के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में कई और बड़े खुलासे हो सकते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की आर्थिक जांच भी कर रही है। आरोपियों की संपत्तियों, बैंक खातों और लेनदेन की पड़ताल की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस अवैध कमाई का इस्तेमाल कहां-कहां किया गया। संभावना जताई जा रही है कि जांच की आंच कुछ और अधिकारियों और कारोबारियों तक भी पहुंच सकती है।
महासमुंद का यह गैस घोटाला अब प्रदेश के सबसे बड़े प्रशासनिक घोटालों में गिना जा रहा है। जनता के लिए सब्सिडी और घरेलू उपयोग की गैस को माफियाओं की तरह बेचने का यह मामला सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि जनता के भरोसे के साथ भी बड़ा धोखा माना जा रहा है। अब पूरे प्रदेश की नजर पुलिस जांच पर टिकी है कि इस घोटाले में और कौन-कौन चेहरे बेनकाब होते हैं।

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