“सुशासन तिहार” में फूटा सिस्टम का सच: PM आवास के लिए अफसरों के पैरों में गिरा बुजुर्ग आदिवासी दंपत्ति,वायरल VIDEO से मचा बवाल
छत्तीसगढ़ – गरियाबंद जिले से निकली एक तस्वीर ने सरकार के “सुशासन” के तमाम दावों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जिस राज्य में योजनाओं के विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जहां मंचों से गरीबों के उत्थान और आदिवासियों के विकास के दावे किए जा रहे हैं, उसी राज्य में राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले कमार जनजाति के बुजुर्ग दंपत्ति को एक अदद छत के लिए अफसरों के पैरों में गिरना पड़ रहा है। यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का चेहरा है जिसने गरीब को इंसान नहीं, फाइल का नंबर बनाकर छोड़ दिया है।
गरियाबंद जिले के देवभोग विकासखंड के माडागांव में “सुशासन तिहार” का आयोजन किया गया था। मंच सजा था, अधिकारी मौजूद थे, योजनाओं की उपलब्धियां गिनाई जा रही थीं, जनता की समस्याएं सुनने का दावा किया जा रहा था। लेकिन तभी वहां ऐसा दृश्य सामने आया जिसने पूरे कार्यक्रम की चमक को शर्म में बदल दिया। बरही गांव से आए बुजुर्ग कमार दंपत्ति अचानक जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर के पैरों में गिर पड़े। उन्होंने जमीन पर दंडवत होकर हाथ जोड़ लिए। आंखों में आंसू थे, चेहरे पर बेबसी थी और जुबान पर सिर्फ एक मांग — “साहब, हमें भी रहने के लिए एक घर दिला दो।”
यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोग सन्न रह गए। मंच पर बैठे अधिकारी भी असहज हो उठे। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों? क्या देश के सबसे कमजोर और पिछड़े समुदायों में गिने जाने वाले लोग अब भी योजनाओं की सूची में जगह पाने के लिए अफसरों के सामने गिरने को मजबूर हैं? अगर हां, तो फिर “सुशासन” आखिर किसके लिए है?
सबसे बड़ा सवाल प्रधानमंत्री आवास योजना की जमीनी हकीकत पर उठ रहा है। सरकार लगातार दावा करती रही है कि हर गरीब को पक्का मकान मिलेगा। लेकिन गरियाबंद की यह तस्वीर बता रही है कि गरीब आज भी दर-दर भटक रहा है। दंपत्ति का दर्द सिर्फ एक घर का नहीं है, बल्कि उस पूरे सिस्टम का है जहां पात्र व्यक्ति सालों तक सूची से बाहर रहता है और अपात्र लोग लाभ ले जाते हैं।
जानकारी के मुताबिक यह बुजुर्ग दंपत्ति विशेष पिछड़ी कमार जनजाति से संबंध रखते हैं। कमार जनजाति को राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहा जाता है और इनके विकास के लिए अलग से योजनाएं चलाने के दावे किए जाते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि जिन लोगों को सबसे ज्यादा संरक्षण मिलना चाहिए था, वे आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं।
बुजुर्ग दंपत्ति की आंखों में वर्षों का दर्द साफ दिखाई दे रहा था। बताया जा रहा है कि वे लंबे समय से पक्के मकान की मांग कर रहे हैं। कई बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए, आवेदन दिए, गुहार लगाई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। जब माडागांव में सुशासन तिहार लगा तो उन्हें लगा शायद इस बार उनकी सुनवाई हो जाएगी। इसी उम्मीद में वे शिविर पहुंचे थे। लेकिन वहां भी जब उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला तो वे भावुक होकर अफसर के पैरों में गिर पड़े।
सोशल मीडिया पर यह वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या यही है सरकार का सुशासन? क्या गरीब को उसका अधिकार पाने के लिए अपनी इज्जत तक दांव पर लगानी पड़ेगी? क्या योजनाएं सिर्फ पोस्टर और भाषणों तक सीमित रह गई हैं?
घटना के बाद जिला पंचायत सीईओ प्रखर चंद्राकर ने सफाई दी है कि दंपत्ति का नाम किसी सर्वे सूची में दर्ज नहीं है। उनका कहना है कि वर्ष 2009 से यह दंपत्ति गांव से बाहर रह रहा था, जिसकी वजह से पीएम आवास योजना की पात्रता सूची में इनका नाम शामिल नहीं हो पाया। उन्होंने आश्वासन दिया कि आगामी सर्वे में उनका नाम प्राथमिकता से जोड़ा जाएगा और उन्हें मकान दिलाने का प्रयास किया जाएगा।
लेकिन प्रशासन की यह सफाई कई सवाल खड़े करती है। अगर कोई गरीब मजदूरी या जीवनयापन के लिए गांव से बाहर चला गया था, तो क्या वह सरकार की नजर में गरीब रहना बंद हो गया? क्या योजनाओं का लाभ सिर्फ उन लोगों को मिलेगा जो हर वक्त गांव में मौजूद रहें? और अगर सर्वे में नाम नहीं था, तो क्या अधिकारियों की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
असल सवाल यह है कि आखिर इतने वर्षों तक किसी ने इस दंपत्ति की सुध क्यों नहीं ली? पंचायत स्तर पर क्या कभी जांच नहीं हुई? क्या स्थानीय प्रशासन को यह नहीं दिखा कि विशेष पिछड़ी जनजाति का एक परिवार आज भी कच्चे घर या बदहाल स्थिति में जी रहा है? अगर नहीं दिखा, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता है।
यह घटना इसलिए भी ज्यादा गंभीर है क्योंकि यह उस वक्त सामने आई है जब सरकार लगातार “सुशासन तिहार” के जरिए जनता तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने का दावा कर रही है। मंचों पर तालियां बज रही थीं, उपलब्धियों के आंकड़े पढ़े जा रहे थे, लेकिन जमीन की सच्चाई ने उसी मंच पर सरकार की पोल खोल दी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि पीएम आवास योजना की सबसे बड़ी समस्या सर्वे और पात्रता सूची की गड़बड़ी है। कई बार वास्तविक गरीब छूट जाते हैं जबकि प्रभावशाली लोग सूची में शामिल हो जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वे की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होने के आरोप पहले भी लगते रहे हैं। गरियाबंद की यह घटना उसी व्यवस्था की एक भयावह तस्वीर बनकर सामने आई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कमार जनजाति के कई परिवार आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी योजनाएं कागजों में ज्यादा दिखाई देती हैं, जबकि जमीनी स्तर पर हालात बेहद खराब हैं। सरकार जिन जनजातियों को संरक्षण देने का दावा करती है, उन्हीं के लोग आज अपने अधिकारों के लिए अधिकारियों के सामने दंडवत होने को मजबूर हैं।
यह तस्वीर सिर्फ एक बुजुर्ग दंपत्ति की नहीं, बल्कि उन लाखों गरीबों की है जो सरकारी फाइलों में कहीं खो जाते हैं। जिनकी जिंदगी सर्वे सूची और दस्तावेजों के बीच फंसकर रह जाती है। जिनके पास न पहुंच है, न पहचान, न सिफारिश। और जब सारी उम्मीदें खत्म हो जाती हैं, तब वे इंसाफ के लिए सत्ता और सिस्टम के सामने झुकने को मजबूर हो जाते हैं।
गरियाबंद की यह घटना अब राजनीतिक मुद्दा भी बन सकती है। विपक्ष सरकार पर हमला बोल रहा है और इसे सुशासन के दावों की असलियत बता रहा है। लेकिन राजनीति से अलग हटकर अगर देखा जाए तो यह घटना पूरे प्रशासनिक सिस्टम के लिए चेतावनी है। अगर अब भी व्यवस्था नहीं चेती, तो “गरीब कल्याण” सिर्फ नारों में ही सीमित रह जाएगा।
एक तरफ सरकार कहती है कि हर गरीब को सम्मान के साथ जीवन मिलेगा, दूसरी तरफ गरीब को अपने हक के लिए अफसरों के पैरों में गिरना पड़ रहा है। यह सिर्फ विफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस वादे पर सवाल है जिसमें कहा गया था कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचेगा।
गरियाबंद की यह मार्मिक तस्वीर अब पूरे छत्तीसगढ़ में चर्चा का विषय है। लोग पूछ रहे हैं — अगर राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों की यह हालत है, तो बाकी गरीबों का क्या होगा?

