‘HYPER CLUB’ बना विवादों का अड्डा! IPS अधिकारी की कथित भूमिका की चर्चा जोरों पर.. खास रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ – रायपुर की सबसे हाई-प्रोफाइल मानी जाने वाली वीआईपी रोड इन दिनों एक ऐसे विवाद के केंद्र में है, जिसने पूरे प्रशासनिक सिस्टम की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां संचालित ‘ HYPER CLUB’ अब सिर्फ एक नाइट क्लब नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था को खुली चुनौती देने वाला अड्डा बनता जा रहा है।
आरोप बेहद गंभीर हैं—देर रात तक धड़ल्ले से नाइट पार्टी, तेज म्यूजिक, शराब का खुला दौर और आए दिन होने वाले विवाद। हैरानी की बात यह है कि ये सब उस राजधानी में हो रहा है जहां कमिश्नरी सिस्टम लागू होने के बाद कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। लेकिन ‘हाइपर क्लब’ की गतिविधियां इन दावों को जमीन पर ध्वस्त करती नजर आ रही हैं।

जानकारों की मानें तो यहां होने वाली पार्टियां किसी लोकल स्तर की नहीं होतीं। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों से प्रोफेशनल ऑर्गेनाइज़र बुलाए जाते हैं। हाई-प्रोफाइल भीड़, महंगी शराब और तेज़ संगीत के बीच रात कब सुबह में बदल जाती है, इसका किसी को हिसाब नहीं। नियम-कानून यहां सिर्फ दिखावे के लिए हैं—असल में सब कुछ “मैनेज” बताया जा रहा है।
विश्वतसूत्रो के माध्यम से इस पूरे मामले में सबसे एक आईपीएस अधिकारी को लेकर सामने आ रहा है। शहर में जोरदार चर्चा है कि HYPER CLUB को किसी प्रभावशाली आईपीएस का सीधा संरक्षण प्राप्त है। यही वजह बताई जा रही है कि देर रात तक नियमों की धज्जियां उड़ाने के बावजूद इस क्लब पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही।
अगर यह आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ एक क्लब का मामला नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर गहरी सड़ांध का संकेत है। सवाल यह है कि जब कानून लागू कराने वाला ही कथित तौर पर ऐसे गैरकानूनी गतिविधियों का संरक्षक बन जाए, तो आम जनता किस पर भरोसा करे?
लोगों का गुस्सा भी अब खुलकर सामने आने लगा है। उनका कहना है कि क्लब के बाहर देर रात तक गाड़ियों की कतारें लगती हैं, तेज आवाज में संगीत बजता है और कई बार नशे में धुत लोगों के बीच झगड़े भी होते हैं। बावजूद इसके पुलिस की मौजूदगी या तो नदारद रहती है या सिर्फ औपचारिकता निभाती दिखती है।
सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने इस मामले में सीधे-सीधे जांच की मांग की है। उनका कहना है कि अगर किसी आईपीएस अधिकारी का नाम इस तरह से सामने आ रहा है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर मामले को दबाने की कोशिश अब नहीं चलेगी।
कमिश्नरी सिस्टम लागू होने के बाद राजधानी में कानून का राज स्थापित करने का दावा किया गया था, लेकिन ‘हाइपर क्लब’ का मामला उस दावे पर बड़ा धब्बा बनता जा रहा है। यह सवाल अब आम हो गया है—क्या VIP रोड पर कानून का कोई मतलब नहीं? क्या रसूख और पहुंच के आगे नियम-कायदे बेमानी हो चुके हैं?
एक बात तो तय है—अगर इस बार भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संदेश साफ जाएगा कि राजधानी में कानून नहीं, बल्कि प्रभावशाली लोगों की मर्जी चलती है।

