हाईकोर्ट सख्त: RTE एडमिशन में देरी पर स्वतः संज्ञान, स्कूल शिक्षा विभाग से मांगा शपथ पत्र
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक अहम और संवेदनशील मामला सामने आया है। बिलासपुर स्थित हाईकोर्ट ने गरीब और वंचित छात्रों के हितों की रक्षा को प्राथमिकता देते हुए बड़ा कदम उठाया है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की प्रधान पीठ ने आरटीई (Right to Education) के तहत होने वाले प्रवेश में हो रही देरी और लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए स्वतः संज्ञान लिया है और स्कूल शिक्षा विभाग को शपथ पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

मामला आरटीई के तहत निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित वर्ग के बच्चों को मिलने वाले प्रवेश से जुड़ा है। अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि प्रदेश के अधिकांश जिलों में आवेदन सत्यापन की प्रक्रिया बेहद धीमी गति से चल रही है। विशेष रूप से नोडल प्राचार्यों के स्तर पर हो रही सुस्ती के कारण न केवल आवेदन लंबित हैं, बल्कि इससे पूरे एडमिशन प्रोसेस पर भी असर पड़ रहा है।
कोर्ट के आदेश में उल्लेख किया गया है कि राज्य में प्राप्त आवेदनों की संख्या और उपलब्ध सीटों के बीच असमानता भी देखने को मिल रही है। इसके अलावा स्कूलों में लॉटरी प्रक्रिया 13 से 17 अप्रैल के बीच प्रस्तावित है, लेकिन सत्यापन कार्य अधूरा रहने के कारण इसमें देरी की संभावना जताई जा रही है। इससे अभिभावकों को बार-बार स्कूल और संबंधित कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं, जिससे उन्हें अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए हाईकोर्ट ने एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया और पहले से 8 अप्रैल 2026 को निर्धारित सुनवाई की तारीख से पहले ही मामले की तत्काल सुनवाई की। खास बात यह रही कि जिस दिन सुनवाई हुई, उस दिन कोर्ट में अवकाश था, फिर भी न्यायालय ने छात्रों के हित को सर्वोपरि रखते हुए अदालत खोली और मामले पर विचार किया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता देवर्षि ठाकुर उपस्थित रहे, जबकि राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता पी.के. भादुरी ने पक्ष रखा। इसके अलावा वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष श्रीवास्तव ने भी अपनी दलीलें प्रस्तुत कीं। कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद स्कूल शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव को निर्देशित किया कि वे पूरे मामले में अब तक उठाए गए कदमों और समाचार में प्रकाशित तथ्यों के संबंध में विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करें।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि प्रक्रिया में सुधार नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर गरीब और जरूरतमंद छात्रों के भविष्य पर पड़ेगा। ऐसे में विभाग की जिम्मेदारी है कि वह समयबद्ध तरीके से सभी प्रक्रियाओं को पूरा करे और पारदर्शिता सुनिश्चित करे।
इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां सरकार शिक्षा के अधिकार को लागू करने के दावे कर रही है, वहीं जमीनी स्तर पर हो रही देरी और लापरवाही से योजनाओं का लाभ वास्तविक हितग्राहियों तक समय पर नहीं पहुंच पा रहा है।
हाईकोर्ट की इस सख्ती को शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। अब देखना होगा कि स्कूल शिक्षा विभाग अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए कितनी तेजी से स्थिति को सुधारता है और गरीब छात्रों को उनका अधिकार समय पर दिला पाता है।

