छत्तीसगढ़ में कानून सबके लिए बराबर नहीं? DSP कल्पना वर्मा पर कार्रवाई क्यों अटकी, किसका संरक्षण?
( रिपोर्ट – बिप्लव दत्ता ) रायपुर – छत्तीसगढ़ में अगर किसी पुलिसकर्मी पर आरोप लगता है तो कार्रवाई में देर नहीं होती—लेकिन यह नियम DSP कल्पना वर्मा के मामले में क्यों बदल गया? यही सवाल अब प्रदेश की जनता, पुलिस महकमा और प्रशासनिक गलियारों में गूंज रहा है।
एक तरफ सरकार सख्ती की बात कर रही है, दूसरी तरफ DSP कल्पना वर्मा पर लगे गंभीर आरोपों के बावजूद न सस्पेंशन, न ठोस कार्रवाई। आखिर वजह क्या है?
क्या सिस्टम में किसी का “हाथ” उनके सिर पर है?
प्रदेश के इतिहास में ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं, जहां आरोप लगते ही पुलिसकर्मी सस्पेंड हुए बिना देर किए विभागीय कार्रवाई हुई। हाल ही में बिलासपुर के ASP राजेंद्र जयसवाल को तत्काल सस्पेंड किया जाना इसका ताज़ा उदाहरण है। फिर DSP कल्पना वर्मा के लिए अलग पैमाना क्यों? सूत्रों की मानें तो फाइलें आगे बढ़ने के बावजूद फैसले रोके गए जांच के नाम पर समय खींचा जा रहा है। और अंदरखाने “ऊपर तक बात” होने की चर्चाएं हैं। अगर आरोप बेबुनियाद हैं तो सरकार उन्हें क्लीन चिट क्यों नहीं देती? और अगर आरोप गंभीर हैं तो कार्रवाई से पीछे क्यों हट रही है? यही दोहरे रवैये ने इस मामले को एक अधिकारी का नहीं, पूरे सिस्टम की साख का सवाल बना दिया है। अब यह बहस तेज़ हो रही है कि क्या वर्दी के भीतर भी ‘पावर रैंकिंग’ होती है? और क्या कुछ अफसर कानून से ऊपर हैं?
सरकार कह रही है—जांच जारी है।
लेकिन जनता पूछ रही है—जांच कब तक? अब वक्त बयानबाज़ी का नहीं, फैसले का है। अगर DSP कल्पना वर्मा दोषी हैं तो कार्रवाई हो,
और अगर नहीं—तो उन्हें बचाने वाली चुप्पी भी टूटे। क्योंकि चुप्पी भी कई बार अपराध का हिस्सा होती है।

