छत्तीसगढ़: केवाईसी के नाम पर ‘राशन का डिजिटल डाका’? 85% अपडेट के बाद भी खाली झोले लेकर लौट रहे गरीब!
( रिपोर्ट – बिप्लव दत्ता ) रायपुर – छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) इस वक्त विवादों के केंद्र में है। राज्य की 3 करोड़ की आबादी के बीच ‘चावल’ की राजनीति तो हमेशा से रही है, लेकिन अब ई-केवाईसी (e-KYC) के नाम पर एक ऐसा खेल शुरू हो गया है जिसने गरीबों की थाली से निवाला छीन लिया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 85% राशन कार्डों का केवाईसी पूरा हो चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि रिकॉर्ड अपडेट होने के बाद भी हजारों परिवारों को राशन दुकानों से दुत्कार कर भगाया जा रहा है।
केवाईसी का ‘मायाजाल’: आंकड़े फिट, गरीब हिट!
प्रदेश के विभिन्न जिलों से आ रही रिपोर्ट चौंकाने वाली हैं। जिन हितग्राहियों ने घंटों लाइन में लगकर अपना केवाईसी अपडेट कराया है, उन्हें राशन दुकानों पर यह कहकर लौटाया जा रहा है कि— “आपका नाम पोर्टल पर शो नहीं कर रहा” या “सर्वर डाउन है।” पोर्टल के पीछे का ‘बड़ा खेल’:
डाटा सिंकिंग की सुस्ती: जब 85% केवाईसी सफल है, तो वह डाटा राशन दुकान की मशीनों (e-PoS) तक क्यों नहीं पहुंचा?
सॉफ्टवेयर का बहाना, राशन ठिकाने: आरोप लग रहे हैं कि तकनीकी खामियों का बहाना बनाकर उस राशन को रोका जा रहा है जो असल में गरीबों के लिए आवंटित हो चुका है। आखिर वह ‘रुका हुआ’ राशन जा कहाँ रहा है?
कटौती का नया फॉर्मूला: परिवार के अगर 5 में से 3 सदस्यों का केवाईसी हुआ है, तो केवल 3 लोगों का ही राशन दिया जा रहा है, जबकि बाकी 2 सदस्यों का राशन ‘सिस्टम एरर’ के नाम पर डकारा जा रहा है।
कौन है इस खेल का असली ‘खिलाड़ी’?
जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राशन घोटाला हो सकता है।
राशन माफिया की सक्रियता: केवाईसी की आड़ में ‘होल्ड’ किए गए राशन को खुले बाजार में बेचने की आशंका है।
अधिकारियों की चुप्पी: जिला स्तर पर खाद्य अधिकारियों के पास इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं है कि केवाईसी सफल होने के बाद भी राशन वितरण में बाधा क्यों आ रही है।
पीडि़तों की जुबानी: “साहब, अंगूठा तो लग गया, मोबाइल में मैसेज भी आ गया, पर दुकान वाला कहता है कि अभी चावल नहीं आया। क्या अब हम केवाईसी का कागज खाकर पेट भरें?” — यह दर्द छत्तीसगढ़ के लाखों परिवारों का है।
बड़ा सवाल: जवाबदेही किसकी?
अगर सरकार पारदर्शी व्यवस्था का दावा करती है, तो:
तकनीकी खामियों की सजा गरीब को क्यों मिल रही है?
केवाईसी अपडेट होने के बाद भी राशन न देने वाले दुकानदारों पर एफआईआर (FIR) क्यों नहीं हो रही?
क्या यह 3 करोड़ की जनता के साथ ‘डिजिटल धोखाधड़ी’ नहीं है?

