माना कैम्प के ‘हिंदू मुक्तिधाम’ नामकरण पर राजनीतिक घमासान, बीजेपी-कांग्रेस आमने-सामने
रायपुर : नगर पंचायत माना कैम्प का मुक्तिधाम (श्मशान घाट) अब एक स्थानीय राजनीतिक अखाड़ा बन गया है। मुक्तिधाम का नाम ‘हिंदू मुक्तिधाम’ रखने के फैसले पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच टकराव पैदा हो गया है, जिसमें दोनों पक्ष इस फैसले का श्रेय लेने और एक-दूसरे पर आरोप लगाने में जुटे हैं।
बीजेपी का दावा: ‘गंदी राजनीति’ का पर्दाफाश
नगर पंचायत अध्यक्ष और बीजेपी नेता संजय यादव ने इस मामले में चल रही बयानबाजी को ‘गंदी राजनीति’ करार दिया है। उन्होंने अपने बयान में स्पष्ट किया कि 1 सितंबर 2025 को हुई परिषद की बैठक में सभी पार्षदों ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया था कि मुक्तिधाम का नाम ‘हिन्दू मुक्तिधाम नगर पंचायत माना कैम्प’ रखा जाएगा।

यादव ने कहा कि यह फैसला जनहित में और सर्वसम्मति से लिया गया था। उन्होंने बताया कि कुछ संगठनों की मांग पर तत्काल बोर्ड का रंग बदला गया और नया बोर्ड लगवा दिया गया। उनका कहना है कि जो लोग नगर पंचायत को ‘हिंदू विरोधी’ बता रहे हैं, उन्हें ऐसी नकारात्मक राजनीति छोड़कर समाज के लिए रचनात्मक काम करने चाहिए।
कांग्रेस का पलटवार: ‘दबाव में झुकी बीजेपी’
दूसरी ओर, कांग्रेस नेता मनीष मानिक ने बीजेपी के दावों को सीधे तौर पर चुनौती दी है। मानिक ने कहा कि मुक्तिधाम को ‘हिन्दू’ नाम देना केवल जनता और उनके जैसे नेताओं के सहयोग और समर्थन के कारण ही संभव हो पाया है।
मानिक ने आरोप लगाया कि पहले नगर पंचायत अध्यक्ष ने मुक्तिधाम पर हरे रंग का बोर्ड लगाया था, जिसे बंग बंधुओं (बंगाली समुदाय) के विरोध के बाद बदला गया। सबसे बड़ा आरोप यह है कि मानिक के अनुसार, परिषद की बैठक में संजय यादव ने इस प्रस्ताव को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर बताकर इसे टालने की कोशिश की थी, जिसका पार्षदों ने भी विरोध किया था।
मानिक ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि देर से ही सही, ‘हिंदू भाईयों के समर्थन में’ आकर फैसला लेने के लिए वे अध्यक्ष के आभारी हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे भी अध्यक्ष हिंदू समुदाय की भावनाओं का सम्मान करेंगे और मुक्तिधाम के नियमितीकरण और प्रमाणीकरण में सहयोग करेंगे।
विवाद का मूल कारण
इस विवाद की जड़ में दोनों पक्षों का इस फैसले का राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ है। जहां बीजेपी यह साबित करना चाहती है कि वह हिंदुओं के हित में काम कर रही है, वहीं कांग्रेस यह दर्शाने का प्रयास कर रही है कि बीजेपी दबाव में ही ऐसे फैसले लेती है। यह मामला एक संवेदनशील धार्मिक मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने का एक और उदाहरण बन गया है।

