बिग ब्रेकिंग : पत्रकार को धमकी भरा नोटिस देने वाले कांग्रेस संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला और शहर अध्यक्ष गिरीश दुबे में जमकर विवाद, अपशब्दों का आदान-प्रदान,वीडियो वायरल
रायपुर – छत्तीसगढ़ कांग्रेस इन दिनों गहरे आंतरिक संकट से गुजर रही है। हाल ही में पार्टी के दो वरिष्ठ पदाधिकारियों—रायपुर शहर जिला अध्यक्ष गिरीश दुबे और संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला—के बीच सार्वजनिक स्थान पर हुई तीखी नोकझोंक और अशोभनीय व्यवहार का वीडियो सामने आने के बाद प्रदेश में कांग्रेस की छवि को बड़ा झटका लगा है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल की ईडी कार्रवाई के विरोध में आयोजित नाकाबंदी कार्यक्रम के दौरान यह टकराव देखने को मिला। वीडियो में दोनों नेताओं के बीच आपसी गरमागरमी इस कदर बढ़ गई कि मंच पर ही अपशब्दों का आदान-प्रदान शुरू हो गया। सूत्रों के मुताबिक मामला शारीरिक झड़प तक पहुँचने की स्थिति में था, जिसे मौजूद कार्यकर्ताओं ने संभाला।
यह घटना उस वक्त हुई जब बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता और मीडियाकर्मी मौके पर मौजूद थे। विवाद का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे कांग्रेस की राज्य इकाई की साख को नुकसान पहुंचा है। पार्टी की अंदरूनी कलह और नेतृत्व की अनुशासनहीनता को लेकर आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
छवि पर गहरा असर
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब कांग्रेस पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोपों और ईडी की कार्रवाइयों से घिरी हुई है। पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा, कई वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों और नेताओं के खिलाफ भी जांच चल रही है। चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी ने पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
राज्य की जनता अब कांग्रेस की आंतरिक स्थिति को लेकर सवाल उठा रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगर वरिष्ठ नेताओं का यह हाल है तो पार्टी अनुशासन और सार्वजनिक जिम्मेदारी की स्थिति क्या होगी।
नेतृत्व के सामने चुनौती
छत्तीसगढ़ कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की इस प्रकार की सार्वजनिक बदसलूकी ने राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए भी चिंता बढ़ा दी है। राहुल गांधी लगातार देशभर में संविधान, न्याय और ईमानदारी की बात करते रहे हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में पार्टी के भीतर उभरते ये दृश्य इन मूल्यों पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं।
पार्टी की चुप्पी पर सवाल
अब तक प्रदेश कांग्रेस की ओर से इस घटना पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। पार्टी के भीतर अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग उठने लगी है। अगर जल्द ही नेतृत्व स्थिति को नियंत्रित नहीं करता, तो आगामी चुनावों में पार्टी को इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

