April 24, 2026

त्रिवेणी संगम में नदी के साथ पर्यावरणीय अत्याचार, विभाग की निष्क्रियता

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छत्तीसगढ़ – राजिम, जिसे प्रयाग नगरी के नाम से जाना जाता है, धार्मिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पवित्र स्थल पैरी, सोडूर और महानदी के त्रिवेणी संगम के लिए विख्यात है, जहां इन तीन नदियों का मिलन होता है। संगम के मध्य में प्राचीन कुलेश्वर नाथ मंदिर इस स्थान की महत्ता को और बढ़ाता है। प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के अवसर पर यहां राजिम कुंभ कल्प के नाम से विशाल मेले का आयोजन छत्तीसगढ़ शासन द्वारा किया जाता है, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। लेकिन इस भव्य आयोजन के पीछे त्रिवेणी संगम की नदियों के साथ हो रहे पर्यावरणीय अत्याचार और पर्यावरण विभाग की चिंताजनक निष्क्रियता की कड़वी सच्चाई सामने आ रही है।


मेले के नाम पर पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी

राजिम कुंभ कल्प के दौरान शासन द्वारा मेले की व्यवस्था के लिए त्रिवेणी संगम में बड़े पैमाने पर फर्शी पत्थर और प्लास्टिक की बोरियां बिछाई जाती हैं। ये सामग्रियां नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करती हैं और पर्यावरण संरक्षण के नियमों का खुलेआम उल्लंघन करती हैं। मेला समाप्त होने के बाद ये पत्थर और प्लास्टिक बोरियां नदी में ही छोड़ दी जाती हैं, जिससे नदी का पारिस्थितिक संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, इस गतिविधि से नदी का जलस्तर असंतुलित हो रहा है, और जलीय जीवों के लिए खतरा बढ़ गया है।

लोक निर्माण विभाग की लापरवाही

धमतरी जिले के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की कार्यशैली इस समस्या को और गहरा रही है। मेले के लिए अस्थायी रास्ते बनाने के नाम पर नदी से पत्थर निकाले जाते हैं और बिना किसी योजना के नदी के अन्य हिस्सों में फेंक दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया नदी के प्राकृतिक स्वरूप को नष्ट कर रही है और इसके पारिस्थितिक तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी गतिविधियां नदी के कटाव को बढ़ावा दे सकती हैं, जिससे आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है।


भाजपा शासन में नदी का शोषण

यह कोई नई समस्या नहीं है। पूर्व में भाजपा शासन के 15 वर्षों (2003-2018) के कार्यकाल में भी त्रिवेणी संगम की नदियों के साथ लगातार छेड़छाड़ की गई। उस दौरान नदी में मुरम डालकर इसके प्राकृतिक प्रवाह को अवरुद्ध किया गया, जिसके परिणामस्वरूप नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया। मुरम डालने की प्रक्रिया ने नदी के तल को ऊंचा कर दिया, जिससे जल प्रवाह में कमी आई और राजिम तथा नवापारा नगर के निवासियों को बाढ़, जल संकट और जलीय जैव-विविधता के ह्रास जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। अब फर्शी पत्थरों से नदी को पाटने की तैयारी एक बार फिर नदी के लिए खतरा बन रही है।


पर्यावरण विभाग की निष्क्रियता

इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल और पर्यावरण विभाग की निष्क्रियता सबसे चिंताजनक है। नदी में फर्शी पत्थर, प्लास्टिक और मुरम डालने जैसी गतिविधियां पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और राष्ट्रीय नदी संरक्षण नीतियों का स्पष्ट उल्लंघन हैं, लेकिन पर्यावरण विभाग ने इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। न तो मेले के दौरान पर्यावरणीय नियमों के पालन की निगरानी की जाती है, न ही मेले के बाद नदी की सफाई और पुनर्जनन के लिए कोई कदम उठाए जाते हैं। स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि विभाग की उदासीनता के कारण ही नदी के साथ यह अत्याचार बेरोकटोक जारी है। विभाग की ओर से न तो लोक निर्माण विभाग को कोई दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, न ही पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करने के लिए कोई सर्वेक्षण किया गया है। यह निष्क्रियता नदी के पारिस्थितिक तंत्र के लिए दीर्घकालिक खतरा बन रही है।


स्थानीय समुदाय की चिंताएं

स्थानीय निवासियों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि नदी के साथ हो रहे इस अत्याचार ने राजिम की प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व को गहरी चोट पहुंचाई है। त्रिवेणी संगम की पवित्रता और प्राकृतिक शुद्धता को बनाए रखना शासन और समाज की साझा जिम्मेदारी है, लेकिन बार-बार नियमों की अनदेखी ने लोगों में आक्रोश पैदा किया है। कई सामाजिक संगठनों और स्थानीय नेताओं ने इस मुद्दे को उठाया है और शासन से नदी संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की है।


पर्यावरणीय प्रभाव और भविष्य का खतरा

पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि नदी में फर्शी पत्थर, मुरम और प्लास्टिक डालने से नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है, जिससे जलीय जीवों का आवास नष्ट हो रहा है। प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट पदार्थों के कारण जल प्रदूषण बढ़ रहा है, जो न केवल नदी के लिए, बल्कि इससे जुड़े मानव समुदायों के लिए भी हानिकारक है। यदि इस दिशा में शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो त्रिवेणी संगम अपनी प्राकृतिक और धार्मिक पहचान खो सकता है। नदी के किनारे बसे गांवों और कस्बों में बाढ़, कटाव और जल संकट जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।

आवश्यक कदम और अपील

स्थानीय लोग, पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक संगठन मांग कर रहे हैं कि शासन और पर्यावरण विभाग त्रिवेणी संगम के संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाए। मेले के आयोजन के दौरान पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए। मेले के बाद नदी से फर्शी पत्थर, प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट हटाने के लिए विशेष अभियान चलाया जाए। लोक निर्माण विभाग को नदी में अनियोजित तरीके से पत्थर फेंकने से रोका जाए। पर्यावरण विभाग को अपनी निष्क्रियता त्यागकर नदी के पर्यावरणीय स्वास्थ्य की निगरानी के लिए नियमित सर्वेक्षण और कार्रवाई करनी चाहिए। इसके साथ ही, नदी के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए एक व्यापक योजना बनाई जाए, जिसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित हो।
राजिम का त्रिवेणी संगम छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक, धार्मिक और प्राकृतिक धरोहर का अनमोल प्रतीक है। इसे बचाना केवल शासन और पर्यावरण विभाग की ही नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है। सवाल यह है कि क्या शासन और पर्यावरण विभाग इस पवित्र नदी के संरक्षण के लिए अपनी निष्क्रियता को तोड़कर गंभीर कदम उठाएंगे, या त्रिवेणी संगम के साथ यह पर्यावरणीय अत्याचार अनवरत जारी रहेगा? समय की मांग है कि इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा हो और ठोस कार्रवाई की जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस पवित्र संगम की सुंदरता, पवित्रता और पर्यावरणीय समृद्धि का आनंद ले सकें।

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