“20 करोड़ में OSD बनाने की डील?” EOW के आरोपी अशोक चतुर्वेदी पर सत्ता के गलियारों में फिर बड़ा विस्फोट!भाजपा कार्यालय में हुई कथित सीक्रेट मीटिंग ने मचाया राजनीतिक भूचाल…विशेष रिपोर्ट
रायपुर – छत्तीसगढ़ की राजनीति, नौकरशाही और सत्ता के गलियारों में एक बार फिर अशोक चतुर्वेदी का नाम विस्फोटक तरीके से गूंज रहा है।
कभी EOW-ACB की जांच, आर्थिक अपराधों, भ्रष्टाचार, आय से अधिक संपत्ति और करोड़ों के घोटालों में घिरे रहे पूर्व अधिकारी अशोक चतुर्वेदी अब नए आरोपों और नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा में हैं।
विश्वसनीय सूत्रों और भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर जो दावा किया है, उसने पूरे सिस्टम में सनसनी फैला दी है।
सूत्रों के मुताबिक, 24 दिसंबर 2025 की शाम राजधानी रायपुर स्थित कुशाभाऊ ठाकरे परिसर (भाजपा कार्यालय) में एक बेहद गोपनीय मुलाकात हुई। बताया जा रहा है कि शाम करीब 5 से 6 बजे के बीच अशोक चतुर्वेदी सीधे छत्तीसगढ़ भाजपा के क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल के कार्यालय पहुंचे। और यहीं से शुरू हुई सत्ता, सिस्टम और सौदेबाजी की सबसे विस्फोटक कहानी।
दफ्तर पहुंचते ही क्या हुआ अंदर?
सूत्रों के मुताबिक, अशोक चतुर्वेदी ने जैसे ही अजय जामवाल से मुलाकात की, कुछ मिनटों की बातचीत के बाद माहौल अचानक बदल गया। दावा किया जा रहा है कि बैठक के दौरान अशोक चतुर्वेदी ने अजय जामवाल के कान में ऐसा “राजनीतिक मंत्र” फूंका कि उसके तुरंत बाद अजय जामवाल ने अपने मोबाइल फोन से प्रदेश के कई बड़े अधिकारियों को कॉल लगाना शुरू कर दिया। सूत्रों के अनुसार जिन अधिकारियों को फोन लगाए गए, उनमें —
IAS अधिकारी सुबोध सिंह
IPS एवं DGP अरुण देव गौतम
EOW प्रमुख अमरेश मिश्रा
वरिष्ठ अधिकारी दीपक अंधारे
जैसे बड़े नाम शामिल बताए जा रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि कुछ अधिकारियों ने फोन रिसीव किया, जबकि कुछ ने कॉल उठाने से परहेज किया। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर एक ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसका नाम पहले से आर्थिक अपराध और भ्रष्टाचार के मामलों में जुड़ा रहा हो, सत्ता संगठन के शीर्ष कार्यालय में इतनी सक्रियता क्यों दिखाई गई?
सबसे बड़ा आरोप — “20 करोड़ में OSD बनाने की डील”
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भाजपा के अंदरखाने से सामने आ रही चर्चाओं ने अब इस पूरे मामले को और ज्यादा विस्फोटक बना दिया है। विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि बैठक के दौरान अशोक चतुर्वेदी ने अजय जामवाल से कथित तौर पर यह आग्रह किया कि उन्हें मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का OSD बनवा दिया जाए। और इसके बदले कथित तौर पर 20 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव रखा गया। अगर यह दावा सही है, तो यह सिर्फ राजनीतिक लॉबिंग नहीं, बल्कि सत्ता और पद के लिए करोड़ों की कथित डील का मामला बन सकता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अब तक नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जंगल की आग की तरह फैल चुकी है।
क्या धर्म सिर्फ ढाल है?
सबसे ज्यादा सवाल अब इस बात को लेकर उठ रहे हैं कि क्या आध्यात्म और रामकथा का पूरा मंच सिर्फ “इमेज वॉशिंग” का हिस्सा है? क्योंकि एक तरफ मंचों पर भजन, कथा, संत और सेवा की बातें हो रही हैं…
दूसरी तरफ अंदरखाने सत्ता में वापसी, पद की चाह और करोड़ों की कथित डील की चर्चाएं चल रही हैं।
यानी बाहर “रामकथा”…
और अंदर “पावर गेम”?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सिर्फ धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह एक बड़े नेटवर्क, प्रभाव और सिस्टम में फिर से एंट्री की कोशिश भी हो सकती है।
EOW की फाइलों से आश्रम तक का सफर
याद दिला दें कि अशोक चतुर्वेदी का नाम पहले भी EOW और ACB की जांचों में सामने आ चुका है। उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, निविदा अनियमितता, आय से अधिक संपत्ति और IPC की गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की चर्चा रही है। गिरफ्तारी, पूछताछ और विशेष अदालत में चालान पेश होने के बाद उनका नाम प्रदेश के चर्चित आर्थिक अपराध मामलों में शामिल हो गया था।
लेकिन अब वही चेहरा “डॉ. अशोक हरिवंश” बनकर आध्यात्मिक मंचों पर सक्रिय दिखाई दे रहा है। राम मिलेंगे आश्रम, कथा आयोजन, बड़े संतों की मौजूदगी और राजनीतिक चेहरों की एंट्री ने इस पूरी कहानी को और ज्यादा रहस्यमय बना दिया है।
“राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि अशोक चतुर्वेदी सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेस शासनकाल में भी सत्ता के बेहद करीब माने जाते रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस शासन काल के उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव के साथ भी उनकी नजदीकियों की चर्चा लंबे समय तक रही। कहा जाता है कि अगर पिछली कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री पद का चर्चित ‘ढाई-ढाई साल’ वाला फार्मूला लागू हो जाता और टी.एस. सिंहदेव मुख्यमंत्री बनते, तो अशोक चतुर्वेदी को OSD बनाए जाने की पूरी तैयारी थी। लेकिन सत्ता का समीकरण बदला, टी.एस. सिंहदेव मुख्यमंत्री नहीं बन पाए और चतुर्वेदी की OSD बनने की महत्वाकांक्षा अधूरी रह गई।”
“अब सवाल यही उठ रहा है कि क्या सत्ता बदलती रही… लेकिन अशोक चतुर्वेदी की सत्ता के करीब पहुंचने की कोशिश कभी खत्म नहीं हुई?”
सवालों के घेरे में सत्ता की नजदीकियां
अब सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतने गंभीर आरोपों और चर्चाओं के बावजूद सत्ता संगठन के शीर्ष नेताओं से इतनी नजदीकी कैसे बनी हुई है?
क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत संबंध हैं?
या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक समीकरण काम कर रहा है?
अगर कथित फोन कॉल और 20 करोड़ की डील वाली बातें सच हैं, तो यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा।
यह सीधे सत्ता, संगठन और सिस्टम की साख पर सवाल खड़े करेगा।
क्या जांच एजेंसियां लेंगी संज्ञान?
अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर उठ रहा है। क्या EOW, ACB या अन्य एजेंसियां इन दावों की जांच करेंगी? क्या भाजपा कार्यालय में हुई कथित बैठक की सच्चाई कभी सामने आएगी? क्या कॉल डिटेल्स और सीसीटीवी रिकॉर्ड की जांच होगी? या फिर यह मामला भी बाकी विवादों की तरह धीरे-धीरे राजनीतिक धूल में दब जाएगा?
संत, सत्ता और सौदेबाजी?
शिवरीनारायण में कथा चली
मंच पर संत रहे।
सत्ता के चेहरे मौजूद हुए शामिल।
भजन गूंजे
लेकिन उसी मंच के पीछे अब सत्ता, सौदेबाजी और करोड़ों की कथित डील की चर्चाओं ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। कल तक जिनके नाम के साथ चार्जशीट और भ्रष्टाचार की फाइलें जुड़ी थीं, आज वही व्यक्ति फिर सत्ता के गलियारों में सक्रिय दिखाई दे रहा है।
और अब सबसे बड़ा सवाल यही है —
क्या यह आध्यात्मिक परिवर्तन है… या फिर सत्ता में वापसी का सुनियोजित ऑपरेशन?
क्या धर्म की आड़ में फिर कोई बड़ा खेल खेला जा रहा है?
और क्या करोड़ों की कथित डील के जरिए सिस्टम में दोबारा एंट्री की कोशिश हो रही है?
छत्तीसगढ़ की राजनीति अब इन सवालों के जवाब का इंतजार कर रही है…
क्योंकि इस कहानी में सिर्फ धर्म नहीं…
सत्ता, सिस्टम और सौदेबाजी की गंध भी महसूस की जा रही है।

