ब्रेकिंग : “रसूखदारों को बचाने 78 किसानों की जमीन कुर्बान!”मांढ में ट्रांसमिशन टॉवर घोटाले पर फूटा किसानों का गुस्सा, जनसुनवाई में प्रशासन के खिलाफ बगावत
छत्तीसगढ़ – रायपुर जिले के खरोरा तहसील अंतर्गत ग्राम मांढ में हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाइन और टॉवर लगाने के नाम पर बड़ा खेल सामने आया है। किसानों का आरोप है कि प्रशासन, राजस्व विभाग और कंपनी की मिलीभगत से छोटे किसानों की जमीनों को निशाना बनाकर ऐसा नक्शा तैयार किया गया, जिससे रसूखदारों की जमीन बच जाए और गरीब किसानों की खेती तबाह हो जाए। सोमवार को हुई जनसुनवाई में किसानों का गुस्सा फूट पड़ा। किसानों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि बिना सूचना, बिना सहमति और बिना पारदर्शिता के उनकी जमीनों पर ट्रांसमिशन टॉवर लगाने की तैयारी कर ली गई।
मामला विद्युत मंडल सब स्टेशन खरोरा से मेसर्स शारडा एनर्जी मिनरल्स लिमिटेड तक बिछाई जा रही हाईटेंशन पारेषण लाइन का है। इस परियोजना के तहत चार गांवों से लाइन गुजारी जा रही है, लेकिन ग्राम मांढ में सबसे बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। यहां करीब 78 किसानों की भूमि प्रभावित हो रही है। किसानों का कहना है कि उनकी जमीनों पर ट्रांसमिशन टॉवर लगाए जाने हैं, लेकिन उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं दी गई। जब खेतों में सर्वे और चिन्हांकन शुरू हुआ, तब ग्रामीणों को इस “खेल” की भनक लगी।
जनसुनवाई में पहुंचे किसानों ने प्रशासन को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया। किसानों ने आरोप लगाया कि पूरे मामले में गरीब किसानों को बलि का बकरा बनाया गया है। प्रभावित किसानों में सुखबती नशीने, राजूलाल पाल, धन्नुलाल, संगीता देवांगन, रघुनाथ भारद्वाज समेत अन्य ग्रामीणों ने बताया कि शुरूआती सर्वे में सिर्फ 15 किसानों की जमीन प्रभावित हो रही थी और लगभग 4 किलोमीटर की लाइन खेतों से होकर गुजर रही थी। उस प्रस्तावित नक्शे में कुछ हिस्सा शासकीय भूमि का भी शामिल था। किसानों के मुताबिक पहला नक्शा लगभग अंतिम रूप ले चुका था, लेकिन जैसे ही कुछ प्रभावशाली लोगों को पता चला कि उनकी जमीन भी प्रभावित हो सकती है, पूरा खेल बदल दिया गया।
ग्रामीणों का आरोप है कि राजनीतिक दबाव के चलते दोबारा सर्वे कराया गया और नया नक्शा तैयार कर दिया गया। इस नए नक्शे में लाइन की लंबाई लगभग दोगुनी कर दी गई। अब 4 किलोमीटर की जगह लगभग 8 किलोमीटर क्षेत्र में लाइन गुजरेगी और सिर्फ 15 नहीं बल्कि 78 छोटे किसानों की जमीन प्रभावित होगी। किसानों ने आरोप लगाया कि पटवारी, राजस्व निरीक्षक और तहसील कार्यालय स्तर पर मिलीभगत कर यह बदलाव किया गया ताकि रसूखदारों की जमीन बच सके।
ग्रामीणों का कहना है कि यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं बल्कि उनके जीवन और भविष्य पर हमला है। जिन खेतों में टॉवर लगाए जाएंगे, वहां खेती प्रभावित होगी, बड़े कृषि उपकरण नहीं चल पाएंगे और जमीन का मूल्य भी खत्म हो जाएगा। किसानों का कहना है कि एक बार टॉवर लग गया तो आने वाली पीढ़ियां भी उस नुकसान को झेलेंगी।
सबसे बड़ा विवाद मुआवजे को लेकर भी सामने आया है। किसानों का आरोप है कि करोड़ों की जमीन के बदले उन्हें “कोड़ियों के भाव” मुआवजा दिया जा रहा है। किसानों के मुताबिक जिस जमीन पर टॉवर लगाया जाना है, उसके लिए 200 रुपए प्रति वर्गफीट और जहां से हाईटेंशन तार गुजरना है वहां 100 रुपए प्रति वर्गफीट के हिसाब से मुआवजा तय किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि यह दर बाजार मूल्य की तुलना में कई गुना कम है। आसपास की जमीनों की कीमत लाखों रुपए प्रति डिसमिल तक पहुंच चुकी है, लेकिन प्रशासन किसानों को बेहद कम राशि देकर मामला निपटाना चाहता है।
किसानों ने यह भी खुलासा किया कि इस मामले को लेकर कुछ प्रभावित किसान हाईकोर्ट पहुंच चुके हैं। याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एसडीएम तिल्दा को जनसुनवाई कर आपत्तियों का निराकरण करने और उचित मुआवजा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद मुआवजा राशि में थोड़ी बढ़ोतरी जरूर हुई, लेकिन किसानों का कहना है कि यह बढ़ोतरी केवल दिखावा है। वास्तविक बाजार मूल्य के सामने यह राशि आज भी बेहद कम है।
इस पूरे विवाद ने तब और तूल पकड़ लिया जब ग्राम पंचायत मांढ के सरपंच विनय कुमार वर्मा भी किसानों के समर्थन में खुलकर सामने आ गए। सरपंच ने एसडीएम तिल्दा और संबंधित थाना प्रभारी को पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने साफ कहा है कि छोटे किसानों की खेती ही उनके परिवार का एकमात्र सहारा है। खेतों में विशाल ट्रांसमिशन टॉवर खड़े होने से खेती चौपट हो जाएगी और ग्रामीणों की आजीविका पर सीधा असर पड़ेगा। सरपंच ने प्रशासन से मांग की है कि किसानों की सहमति और उचित मुआवजा के बिना किसी भी प्रकार का कार्य रोका जाए।
जनसुनवाई के दौरान माहौल इतना गर्म हो गया कि कई किसानों ने प्रशासन पर खुलेआम पक्षपात और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। ग्रामीणों का कहना था कि यदि प्रशासन ने उनकी बात नहीं सुनी तो वे उग्र आंदोलन करेंगे। कई किसानों ने यह भी चेतावनी दी कि वे अपनी जमीन पर जबरन टॉवर नहीं लगने देंगे।
इस मामले ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अधिसूचना जारी हुई थी, तो अधिकांश किसानों को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली? यदि पहला सर्वे सही था तो दोबारा सर्वे की जरूरत क्यों पड़ी? आखिर किन लोगों के दबाव में पूरा नक्शा बदला गया? और सबसे अहम सवाल—क्या छोटे किसानों की जमीन बचाने के बजाय उन्हें ही निशाना बनाया गया?
मामले में एसडीएम तिल्दा आशुतोष देवांगन ने कहा कि सर्वे और नक्शा के बाद अधिसूचना जारी कर नगर पंचायत में चस्पा की गई थी। जनसुनवाई में किसानों ने सूचना दिए बिना भूमि चयन, कम मुआवजा और दोबारा सर्वे पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि सभी बिंदुओं पर विचार कर निर्णय लिया जाएगा।
लेकिन गांव के किसानों का भरोसा अब प्रशासन से उठता नजर आ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यह परियोजना जनहित की है तो फिर गरीब किसानों पर ही क्यों थोपी जा रही है? आखिर क्यों रसूखदारों की जमीन बचाने के लिए दर्जनों छोटे किसानों की जिंदगी दांव पर लगाई जा रही है? मांढ का यह मामला अब सिर्फ ट्रांसमिशन टॉवर का नहीं, बल्कि सत्ता, दबाव और किसानों के अधिकारों की लड़ाई बनता जा रहा है।

