भैरवी माता की जमीन पर कब्जे का आरोप! शासकीय भूमि पर कॉलोनाइजर का खेल, सरपंच-सचिव पर मिलीभगत के गंभीर आरोप
जगदलपुर – बस्तर जिले की ग्राम पंचायत आड़ावाल में शासकीय भूमि को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। गांव की आस्था और परंपरा से जुड़ी भैरवी माता देवगुड़ी की जमीन पर निजी कॉलोनाइजर को कब्जा दिलाने का गंभीर आरोप लगा है। ग्रामीणों ने पंचायत के सरपंच और सचिव पर मिलीभगत कर शासकीय भूमि को कॉलोनाइजर बख्तियार खान की कंपनी को सौंपने का आरोप लगाया है। मामले ने अब तूल पकड़ लिया है और ग्रामीण खुलकर प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार खसरा क्रमांक 238 की यह जमीन वर्षों से भैरवी माता देवगुड़ी की जात्रा और धार्मिक आयोजनों के लिए आरक्षित रही है। गांव के लोग इस भूमि को धार्मिक और सामुदायिक आस्था का केंद्र मानते हैं। आरोप है कि पंचायत प्रतिनिधियों ने नियमों को ताक पर रखकर इस जमीन की एनओसी कॉलोनाइजर को दे दी और अब वहां निजी निर्माण और कॉलोनी विकसित करने की तैयारी चल रही है।
सरपंच-सचिव पर मिलीभगत का आरोप
ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है। आरोप है कि सरपंच जयंती कश्यप और पंचायत सचिव ने बिना ग्रामसभा की सहमति और बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए शासकीय भूमि को निजी हाथों में सौंप दिया।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि पंचायत के पास किसी भी शासकीय भूमि को बेचने, पट्टे पर देने या निजी कॉलोनाइजर को हस्तांतरित करने का अधिकार नहीं होता। इसके बावजूद कथित रूप से एनओसी जारी कर दी गई। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर किसके दबाव में यह पूरा खेल किया गया और प्रशासन अब तक मौन क्यों है।
धार्मिक आस्था पर चोट का आरोप
भैरवी माता देवगुड़ी बस्तर के आदिवासी समाज की आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। यहां हर वर्ष जात्रा और धार्मिक आयोजन होते हैं, जिसमें आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस जमीन पर निजी कब्जा हुआ तो धार्मिक परंपराएं समाप्त हो जाएंगी और इससे सामाजिक तनाव भी बढ़ सकता है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की तो बड़ा आंदोलन खड़ा हो सकता है और धार्मिक भावना भड़कने की स्थिति बन सकती है।
एक साल से जांच, फिर भी कार्रवाई नहीं
मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायत के बाद एसडीएम स्तर पर जांच की बात कही गई थी, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी न तो जांच पूरी हुई और न ही किसी आरोपी पर कार्रवाई हुई।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि मामला आम लोगों से जुड़ा होता तो प्रशासन तत्काल कार्रवाई करता, लेकिन यहां कॉलोनाइजर और प्रभावशाली लोगों की वजह से फाइल दबाई जा रही है। यही वजह है कि अब ग्रामीणों में प्रशासन के खिलाफ भी आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
सवाल पूछने पर भाग खड़ी हुई सरपंच
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जब गांव के लोगों ने सरपंच जयंती कश्यप से इस संबंध में सवाल पूछे तो उन्होंने जवाब देने के बजाय वहां से निकलना ही बेहतर समझा। इससे ग्रामीणों का शक और गहरा गया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि बख्तियार खान की आरडीसी कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए पूरी प्रक्रिया को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया। अब गांव के लोग मांग कर रहे हैं कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच हो और जमीन के दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं।
उच्च स्तरीय मिलीभगत की आशंका
मामले में अब कई बड़े सवाल उठ रहे हैं। आखिर बिना प्रशासनिक संरक्षण के शासकीय भूमि की एनओसी कैसे जारी हो गई? क्या अधिकारियों की जानकारी के बिना यह संभव था? क्या जांच को जानबूझकर लंबा खींचा जा रहा है?
ग्रामीणों और आदिवासी समाज के पदाधिकारियों का कहना है कि यदि दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन करेंगे और जिला मुख्यालय का घेराव भी किया जाएगा।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
खसरा क्रमांक 238 की तत्काल राजस्व जांच
कथित अवैध एनओसी रद्द की जाए
सरपंच, सचिव और कॉलोनाइजर पर एफआईआर दर्ज हो
धार्मिक स्थल की भूमि को संरक्षित घोषित किया जाए
पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो।

