“छत्तीसगढ़ी लोकभाषा और साहित्य को मिला सम्मान का नया मंच, ‘मन के पांखी’ के लिए डूमनलाल ध्रुव सम्मानित”
रायपुर – छत्तीसगढ़ की लोकभाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देने वाला एक गरिमामय आयोजन राजधानी रायपुर स्थित स्पीकर हाउस के सभागृह में संपन्न हुआ। तथागत ट्रस्ट द्वारा आयोजित “भगवती लाल सेन लोकभाषा तथागत छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मान समारोह” में प्रदेश के साहित्यकारों, शिक्षाविदों, सामाजिक प्रतिनिधियों और साहित्य प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह रहे, जिन्होंने साहित्य की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि “साहित्य समाज को दिशा देने का कार्य करता है और लोकभाषाओं का संरक्षण हमारी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखता है।”

समारोह का सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब आया जब वर्ष 2025 का प्रतिष्ठित तथागत साहित्य सम्मान छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डूमनलाल ध्रुव को उनकी चर्चित कृति ‘मन के पांखी’ के लिए प्रदान किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह तथा 51 हजार रुपये की सम्मान राशि भेंट की गई। सम्मान ग्रहण करते समय सभागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
डॉ. रमन सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि छत्तीसगढ़ की लोकभाषा और लोकसंस्कृति प्रदेश की आत्मा है। लोकभाषा में रचा गया साहित्य समाज की भावनाओं, संघर्षों और संस्कृति को जीवंत बनाए रखता है। उन्होंने तथागत ट्रस्ट की सराहना करते हुए कहा कि यह संस्था लगातार साहित्यिक और शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से समाज को सकारात्मक दिशा देने का कार्य कर रही है। उन्होंने यह भी घोषणा की कि विधानसभा अध्यक्ष कार्यालय का सभागृह भविष्य में भी साहित्यिक आयोजनों के लिए निःशुल्क उपलब्ध रहेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शशांक शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा और लोक साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने में साहित्यकारों की अहम भूमिका है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता और तकनीक के इस दौर में युवा पीढ़ी को अपनी लोकभाषा से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने अनेक वरिष्ठ छत्तीसगढ़ी रचनाकारों का स्मरण करते हुए युवाओं से साहित्य सृजन में आगे आने का आह्वान किया।
विशिष्ट अतिथि भारतीय शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. एन.पी. सिंह ने भी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए स्थानीय भाषाओं के संरक्षण को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा कि मातृभाषा और लोकभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की चेतना और संस्कृति का आधार होती हैं। उन्होंने तथागत ट्रस्ट के प्रयासों को समाज और साहित्य के लिए प्रेरणादायी बताया।

सम्मानित साहित्यकार डूमनलाल ध्रुव ने भावुक शब्दों में कहा कि यह सम्मान उनके लिए अत्यंत गर्व और जिम्मेदारी का क्षण है। उन्होंने कहा कि ‘मन के पांखी’ में उन्होंने छत्तीसगढ़ की मिट्टी, गांव, रिश्तों और लोकजीवन की संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि लोकभाषा में लिखा गया साहित्य लोगों के दिलों तक सीधे पहुंचता है और समाज को जोड़ने का काम करता है।
समारोह में साहित्य और लोकसंस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले कुल 16 छत्तीसगढ़ी साहित्यकारों और रचनाकारों को भी सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में चयन समिति के अध्यक्ष प्रो. पीयूष कुमार, डॉ. भुवाल सिंह ठाकुर, डॉ. भारती मांडवी, डॉ. सियाराम शर्मा और संकल्प पहटिया की भूमिका की भी सराहना की गई।
कार्यक्रम के दौरान सभागृह में साहित्यिक ऊर्जा और सांस्कृतिक चेतना का विशेष वातावरण देखने को मिला। मंच पर मौजूद अतिथियों ने कहा कि छत्तीसगढ़ की असली पहचान उसकी लोकभाषा, लोकगीत, लोककथाएं और जनजीवन से जुड़ी साहित्यिक परंपरा में बसती है। यदि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना है तो ऐसे आयोजनों को लगातार बढ़ावा देना होगा।
तथागत ट्रस्ट की ओर से राजेश सिंह राणा और ट्रस्टी श्रीमती जिज्ञासा सिंह राणा ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों और उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट आगे भी छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य के संवर्धन के लिए निरंतर कार्य करता रहेगा।
पूरे समारोह ने यह संदेश दिया कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने, संस्कारों को जीवित रखने और संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम है। रायपुर में आयोजित यह समारोह छत्तीसगढ़ की साहित्यिक चेतना के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।

